शहीद भगत सिंह | जीवन परिचय एवं तथ्य | Bhagat singh biography in hindi

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Bhagat singh biography in hindi |  भगत सिंह भारतीय स्वाधीनता संग्राम की चेतना के एक महान नायक, भारतीय स्वंतंत्रता आन्दोलन के एक महान क्रन्तिकारी योद्धा थे. वो सर्व समाज की बेहतरती के महान स्वपनद्रष्टा एवं उच्च नैतिक मापदंडों के पैरोकारी भी थे. आज अंग्रेजी सरकार के खिलाफ भारतीय युद्ध के प्रतीक भी है.  मात्र 23 वर्ष के जीवनकाल में ही उनके द्वारा किये गए कार्य आज भी नौजवानो के लिए एक नव ऊर्जा के स्रोत की तरह है. भारत की स्वाधीनता के लिए भगत सिंह ने जिस अदम्य साहस के साथ अंग्रेजो से लड़ते हुवे अपने प्राणों की आहुति दी थी उसे  हमेशा बहुत सम्मान के साथ याद किया जाता है. (Bhagat singh ka jiwan parichay)

भगत सिंह मार्क्सवादी विचारधारा से प्रभावित थे, और उनका मानना था कि हमें भारत को भारत के सामाजिक ताने-बाने के साथ ही सामाजिक समानता एवं सर्व उन्नति के रास्ते पर ले जाना होगा. जलियाँवाला बाग़ हत्याकांड से प्रभावित होकर शुरू हुवा उनका क्रन्तिकारी सफर लाहौर में अंग्रेज पुलिस अधिकारी जे. पी. सांडर्स की हत्या से लेकर, दिल्ली स्थित नेशनल असेम्बली में बम फेकने के बाद फांसी के फंदे में हसते हुवे झूलने पर ख़तम हुवा.  शहीद- ऐ- आजम भगत सिंह आज भी करोड़ों भारतीय युवाओं की प्रेरणा है. बहुत कम उम्र में ही उनके विचार आज भी हम सब को राह दिखाते है. (Bhagat Singh Biography In Hindi)

Table of Contents

सरदार भगत सिंह का प्रारंभिक जीवन (Starting age of bhagat singh)

भगत सिंह का जन्म तात्कालिक ग्राम बंगा, तहसील-जरांवाला, जिला-ल्यालपुर, प्रान्त-पंजाब, ब्रिटिश भारत. (वर्तमान पाकिस्तान के पंजाब प्रान्त के फैसलाबाद जिले) में 27 सितम्बर 1907 को एक जाट सिक्ख परिवार में हुवा था. माता का नाम विद्यापति व पिता का नाम सरदार किशन सिंह संधू था.  जन्म के समय  उनके पिता किशन सिंह सिंधु जेल में थे. भगत सिंह का पैतृक गांव-खटकर कलां, जिला-नवांशहर पंजाब (भारत) था. जो की अब के शहीद भगत सिंह नगर के नाम से जाना जाता है. (Bhagat singh ka jiwan parichay)

भगत सिंह के परिवार के कुछ सदस्य भारतीय स्वाधीनता आंदोलन से जुड़े हुवे थे, वही  कुछ लोग महाराजा रणजीत सिंह की फौज में थे. भगत सिंह के दादा अर्जुन सिंह स्वामी दयानद स्वरस्वती के विचारों से प्रभावित थे. यही वजह थी कि भगत सिंह का परिवार आर्य समाज को मानता था. भगत सिंह के पिता किशन सिंह और एक चाचा ग़दर पार्टी के कार्यकर्ता थे जो कि भारतीय स्वाधीनता सघर्ष के लिए सिक्खो द्वारा बनाया गया एक संगठन था.

भगत सिंह के दादा  चाहते थे कि उनका पोता हिन्दुस्तानी संस्कृति और संस्कारो को समझते हुवे पढाई करे इसलिए उन्होंने भगत सिंह का प्रवेश एक आर्य समाजी स्कूल “दयानन्द एंग्लो वैदिक हाई स्कूल” में कराया. वो अंग्रेजो द्वारा चलाये जा रहे शैक्षिक संस्थानों में उनको भेजने के पक्ष में तो कतई नहीं थे. (Bhagat Singh Biography In Hindi)

उच्च शिक्षा और जलियावाला बाग घटना (Higher education and jaliyawala bag massacre)

बहरहाल भगत सिंह धीरे- धीरे बड़े हुवे. इसी दौरान वो अंग्रेजों द्वारा भारतीयों पर किये जा रहे अत्याचारों को भी देखते समझते रहे और अंग्रेजी शासन के खिलाफ चल रहे अनेको आंदोलनों को भी उन्होंने काफी करीबी से समझा. महात्मा गाँधी जी के विचारों का भी भगत सिंह के जीवन में गहरा प्रभाव था. भगत सिंह मात्र 14 वर्ष के ही थे तब जलियाँ वाला बाग हत्याकांड हुवा. हत्याकांड के तुरंत बाद सरदार भगत सिंह भी उस जगह पर पहुच गए. वहां के हालत देख कर भगत सिंह बहुत दुखी हुवे. (bhagar singh ka jiwan parichay)

इस घटना ने भगत सिंह के जीवन में बहुत गहरा प्रभाव डाला और वो अंगेजो के खिलाफ हो रहे लगभग हर तरह के विरोधों के बारे में जानने और समझने की कोशिश करने लगे. इसी बीच वो महात्मा गाँधी जी द्वारा चलाये जा रहे असहयोग-आन्दोलन में भी अपनी तरफ से बढ़- चढ़ कर हिस्सा लेने लगे. 1922 में महात्मा गाँधी जी द्वारा असहयोग-आन्दोलन के वापस लिए जाने के बाद सरदार भगत सिंह का मन खिन्नता से भर गया और उन्होंने फैसला किया कि अहिंसा का रास्ता  छोड़ कर अंग्रेजों को उन्ही की भाषा में जबाब दिया जायेगा. इसी दौरान भगत सिंह “यंग रिवोल्यूस्नरी मूवमेंट” नामक एक संगठन से जुड़ गये और क्रन्तिकारी तरीकों से अंग्रेजों को भारत से खदेड़ने की योजना बनाने लगे.

इसी बीच 1923 में भगत सिंह ने लाहौर स्थित नेशनल कॉलेज में बीए की पढाई के लिए प्रवेश लिया. अपने कॉलेज के दिनों में भी भगत सिंह अलग-अलग तरह के छोटे-बड़े क्रियाकलापों के द्वारा देश सेवा और स्वाधीनता के लिए कार्य करते रहे. (Bhagat Singh Biography In Hindi)

चंद्रशेखर आजाद के साथ भगत सिंह (Bhagat singh and chandra shekhar aazad)

लाहौर के नेशनल कॉलेज से पढाई के दौरान ही मार्च 1926 में सरदार भगत सिंह ने “नौजवान भारत सभा” नामक एक संगठन बनाया जिसका उदेश्य अंग्रेजों को भारत से खदेड़ना था. साथ ही सरदार भगत सिंह महान क्रन्तिकारी चंद्रशेखर आजाद के संगठन “हिंदुस्तान रिपब्लिक एसोसिएसन” से भी जुड़े थे. तभी भगत सिंह की मुलाकात कुछ अन्य महान क्रांतिकारियों जैसे चंद्रशेखर आजाद, असफाक उल्ला खान एवं बिश्मिल प्रसाद से हुवी. इसी तरह के विभिन्न संगठनों के साथ मिलकर सरदार भगत सिंह लोगों को आजादी के लिए संगठित होने का सन्देश देने लगे. (Bhagat Singh Biography In Hindi)

इस तरह के क्रन्तिकारी और राजनैतिक क्रियाकलापों की वजह से धीरे- धीरे भगत सिंह का प्रभाव नौजवानों में बढ़ता जा रहा था. स्वाभाविक तौर पर उस समय की अंग्रेजी हुकूमत को ये सब पसंद नहीं आया. अतः मई 1927को सरदार भगत सिंह को गिरफ्तार कर लिए गया और कुछ समय बाद ही 60000 की जमानत पर उनको रिहा भी कर दिया गया. मगर सरदार भगत सिंह कहां मानने वाले थे. उन्होंने अख़बारों और पत्र पत्रिकाओं के जरिये लेख लिखकर क्रांति की मशाल को जलाये रखा. वो लाहौर, देल्ही और अमृतसर से निकलने वाले अनेको पत्र-पत्रिकाओं और अख़बारों में लिखते रहे. और साथ ही अन्य क्रन्तिकारी गतिविधियों भी जारी रखी.

लाला लाजपत राय की मौत का असर (Martyrdom of Lala lajpat rai )

इसी बीच 1929 में ब्रिटिश सरकार ने तत्कालिक भारतीय राजनीती और समाज की स्थिति को समझने के लिए एक आयोग का गठन किया जिसका नाम सायमंड कमीशन था. भारतीय राजनीतिक संगठन इस कमीशन का विरोध कर रहे थे, क्योकि इस कमीसन में कोई भारतीय सदस्य नहीं था. लगभग पूरे भारतवर्ष में ही इस कमीशन का पुरजोर विरोध किया जा रहा था. कमीशन के सदस्य 30 अक्टूबर 1929 को लाहौर की यात्रा पर गये थे. लाहौर में विरोध प्रदर्शन की अगुवाई लाल लाजपत राय कर रहे थे जिस पर अंग्रेजी हुकूमत ने लाठी- चार्ज कर दिया. इस लाठी-चार्ज में लाला लाजपत राय को गंभीर चोटें आई और अंततः 17 नवम्बर 1929 को लाला लाजपत राय शहीद हो गये. सरदार भगत सिंह और अन्य क्रांतिकारियों के ऊपर इस घटना का बहुत बड़ा असर पड़ा. और उन्होंने लाला लाजपत राय के मौत का बदला लेने का संकल्प ले लिया.

अंग्रेज पुलिस अधिकारी जे पी सांडर्स की हत्या ( Saunder’s murder)

चूकी लाला लाजपत राय और विरोध प्रदर्शन कर रहे अन्य लोगों पर बर्बरता पूर्वक लाठी-चार्ज करने का आदेश एक अंग्रेज पुलिस अधिकारी जेम्स ए स्कॉट ने दिए थे. जो कि उस समय पुलिस सुपरिन्टेन्डेन्ट था. अतः भगत सिंह और अन्य क्रांतिकारियों ने उक्त पुलिस अधिकारी को गोली मारने का इरादा कर लिया. 17 दिसम्बर 1929 को लाहौर के पुलिस मुख्यालय से निकलते हुवे क्रांतिकारियों ने गोली चलाई मगर गलती से गोली एक अन्य पुलिस अधिकारी असिस्टेंट सुपरिन्टेन्डेन्ट जे पी सांडर्स को लगी और उसकी मौत हो गई. हालाँकि भगत सिंह अपने तात्कालिक लक्ष्य को भेदने में नाकाम रहे मगर ये उनकी क्रन्तिकारी योजनायों का आगाज था. भगत सिंह का वास्तविक एवं एकमात्र लक्ष्य अब हिंदुस्तान की आजादी था, इसलिए उन्होंने अब भूमिगत रहते हुवे तेजी से संगठन के लिए काम करने का निर्णय ले लिया. (Bhagat singh ka jiwan parichay)

भगत सिंह की क्रन्तिकारी योजनाये (Revolutionary planning of bhagat singh)

सरदार भगत सिंह वामपंथी विचारधारा से प्रभावित थे. मजदूरों एवं किसानों के लिए उनके दिल में आपार प्यार और सदभाव था. वो समाजवाद को मानते और कार्ल मार्क्स के सिद्दांतों पर चलने की कोशिश करते थे. पूंजीपतियों की मजदूरों के प्रति नजरिये और ब्रिटिश सरकार की नीतियों से वो खुश नहीं थे. उस समय भारतीय उधोपतियों का अभाव था और ब्रिटिश उधोगपतियों का ही बोलबाला था. इसलिए अंग्रेजो की सरकार की नीतिया भी उन्ही उधोगपतियों को हिसाब से बनती थी. भारतीय मजदूरों और किसानों के हितो के बारे में सोंचने की अंग्रेजो को कोई जरुरत महसूस नहीं होती थी. भगत सिंह एवं अन्य क्रन्तिकारी संगठन के निर्णय के मुताबिक मजदूर विरोधी नीतियों को ब्रिटिश संसद में पारित नहीं होने देना चाहते थे.

संगठन में काफी विचार विमर्श के बाद ये निर्णय लिया गया कि अंग्रेजों को एहसास कराया जायेगा कि हिन्दुस्तानी अब ज्यादा अत्याचार सहन करने वाले नहीं है. भगत सिंह मानते थे कि इतने आन्दोलनों और विरोध प्रदर्शनो के बाद भी अंग्रेज हुकूमत नहीं मानती है, अतः अग्रेजी सरकार बहरी है. बहरी सरकार को अपनी आवाज सुनाने के लिए धमाको का सहारा लेना पड़ेगा. मगर भगत सिंह बेगुनाहों का खून भी बहाना नहीं चाहते थे इसलिए क्रांतिकारियों ने मिलकर दिल्ली असेम्बली के खाली स्थान पर बम फेकने का निर्णय लिया ताकि किसी का खून न बहे और अंधी-बहरी अंग्रेजी हुकूमत को ये एहसास भी हो जाये कि हिंदुस्तान के लोग अब जाग चुके है. सरदार भगत सिंह और बटुकेश्वर दत्त को सर्वसम्मति से इस कार्य के लिए चुन लिया गया. (Bhagat singh biograraphy in hindi)

एसेम्बली बम कांड और भगत सिंह की गिरफ्तारी (Lahore assembly bombing)

8 अप्रैल 1929 के दिन केंद्रीय असेम्बली में जब सेसन चल रहा था तो भगत सिंह और बटुकेश्वर दत्त ने एक खाली हॉल में बम फेक दिया. पूरी एसेम्बली धुवे के गुबार से भर गई, अफरातफरी में लोग इधर- उधर भागने लगे. भगत सिंह और बटुकेश्वर दत्त भी चाहते तो भाग सकते थे मगर वो भागे नहीं. पहले से किये गए निर्णय के अनुसार उन्होंने अपने साथ लाये हुवे कुछ पेम्पलेट और पर्चे हवा में उछाले, साम्राज्यवाद-मुर्दाबाद, इंकलाब-जिंदाबाद के नारे लगते हुवे वही खड़े रहे. थोड़ी देर बाद पुलिस आई और उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया.

हमारी मातृभूमि ने हमेशा से ही हर छेत्र में क्रांति के लिए अनेक नायक पैदा किये है. महात्मा गाँधी, स्वामी विवेकानंद, भगत सिंह, जवाहरलाल नेहरु, इंदिरा गाँधी आदि अनेकों नाम है जिन्होंने इस मात्रभूमि की सेवा में अपना जीवन लगा दिया.  हम जब भी किसी महान व्यक्ति का जीवन परिचय लिखते है. हमारे पास उसका एक लम्बा जीवनकाल होता है. लेकिन महान क्रांतिकारी भगत सिंह ने बहुत कम जीवनकाल में भी हमें लिखने और समझने को बहुत कुछ दिया है. उनके विचार आज के दौर में भी मानवता को राह दिखा रहे है.आजादी ही नहीं बल्कि जीवन से सम्बंधित अनेकों विचारों के सही मायने समझने के लिए आज भी विद्वान शहीद-ए-आजम भगत सिंह के विचारों एवं जीवन दर्शन की खाक छानते है.” (Bhagat Singh Biography In Hindi) HindiWall

एसेम्बली बम कांड ने पूरे देश में हलचल मचा दी. आम लोग तरह तरह की प्रतिक्रियाए दे रहे थे. देश भर के अलग-अलग राजनीतिक एवं सामाजिक संगठनो की राय भी उस समय के माहौल और परिस्थिति के हिसाब से मिली जुली ही थी. यहाँ तक कि महात्मा गाँधी जी ने भी इस घटना का विरोध किया.

एसेम्बली बम कांड का ट्रायल ( Assembly Incident Trial)

बम कांड से सम्बंधित क़ानूनी कार्यवाही मई महीने में सुनवाई के बाद जून 1929 को शुरू हो चुकी थी. इस केस में बटुकेश्वर दत्त के वकील आसिफ अली थे जो कि खुद एक स्वतन्त्रता संग्राम सेनानी और देशभक्त थे, जबकि भगत सिंह ने अपना बचाव खुद करने का निर्णय लिया.  भगत सिंह और दत्त ने इस पूरी प्रक्रिया को ड्रामा करार देते हुवे लिखा ” हम मानव जीवन को शब्दों से कही ज्यादा पवित्र और महत्वपूर्ण मानते है. हम ना तो डरकोप हैं. ना आतंकी है और न ही पागल. जैसा कि कुछ लोगों और अख़बारों का मत है कि हिंसात्मक बल प्रयोग ठीक नहीं है, हम कहना चाहते है कि वैध कारण के लिए बल प्रयोग करना औचित्यपूर्ण है और हमने वही किया.

बहरहाल 12 जून 1929 को भगत सिंह और बटुकेश्वर दत्त को ताउम्र सजा सुना दी गई. कानूनी कार्यवाही के बारे में भी इतिहासकारों के अलग-अलग मत है. कहा जाता है कि पूरी की पूरी कानूनी प्रक्रिया ही एक ढोंग थी. सारे गवाह और सबूत सरकारी खरीद-फरोक्त के शिकार हो चुके थे. (Bhagat Singh Biography In Hindi)

इसमें से एक उल्लेखनीय तथ्य भगत सिंह के पास से मिली स्वचालित पिस्तौल से सम्बंधित है. गिरफ्तार करने वाले पुलिस अधिकारी का कहना था कि जब उन्होंने भगत सिंह को गिरफ्तार किया तब भगत सिंह की पिस्तौल का रुख जमीन की तरफ था और वो अपनी पिस्तौल के साथ खेल रहे थे. जबकि गवाहों का मत था कि भगत सिंह ने दो या तीन राउंड फायरिंग की थी. इस तरह अभियोजन पक्ष के गवाहों और सबूतों का आपस में टकराव होना ये बताता है कि कानूनी प्रक्रिया का ठीक से पालन नहीं किया गया.  इंडियन लॉ जर्नल के मुताबिक यह पूरी कानूनी प्रक्रिया ही पूर्व नियोजित थी और लगभग सब कुछ फिक्स था.

अन्य क्रांतिकारियों का पकड़ा जाना और सजा (Arrest of companions

(Bhagat Singh Biography In Hindi) 1929 में ही हिंदुस्तान सोसलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएसन ने दो जगह लाहौर और सहारानपुर में बम बनाने के छोटे- छोटे कारखाना खोले थे. अंग्रेज पुलिस को इस बात की खबर लगी तो उन्होंने छापा मारा और हिंदुस्तान सोसलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएसन के महत्वपूर्ण तीन क्रांतिकारियों सुखदेव, किशोरी लाल और जय गोपाल को गिरफ्तार कर लिया. कुछ ही दिनों बाद सहारानपुर में भी यही कार्य दोहराया गया. पकडे गये कुछ लोग पुलिस के गवाह बन गये और पुलिस बम कांड, सांडर्स हत्या कांड और बम फेक्ट्री तीनो के तार जोड़ने में कामयाब हो गई. सरदार भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु सहित 21 अन्य क्रन्तिकारियों को सांडर्स हत्या कांड में भी दोषी करार दे दिया गया. (Bhagat singh ka jiwan parichay)

भूख हड़ताल और लाहौर षड्यंत्र (Lahore conspiracy case)

तमाम सबूतों और गवाह हंसराज बोहरा तथा जय गोपाल आदि सहयोग से अंग्रेजी हुकूमत ने भगत सिंह पर दोबारा कानूनी प्रक्रिया आरम्भ कर दी. भगत सिंह को दिल्ली जेल से केंद्रीय जेल मैन्वाली रावलपिंडी जो की अब पाकिस्तान में है भेज दिया गया. रावलपिंडी जेल में भगत सिंह ने देखा कि वहां भारतीय और अंग्रेज कैदियों में भेदभाव किया जाता है. यहाँ तक कि खाने, और कपडे देने में भी भारतीय कैदियों के साथ दोहरा वर्ताव किया जाता है. और भी लगभग हर मामले में वहां भारतीय कैदियों के साथ अन्याय किया जाता था. यह सब देखकर भगत सिंह चुप न बैठ सके और विरोध करने का निर्णय लिया . भगत सिंह का कहना था कि वो राजनैतिक कैदी है इसलिए उन्हें राजनैतिक कैदियों की तरह रखा जाये. (Bhagat Singh Biography In Hindi)

सरदार भगत सिंह जेल में ही भूख हड़ताल पर बैठ गये, जेल के अन्य भारतीय कैदियों ने भी भगत सिंह का साथ दिया. इस भूख हड़ताल का व्यापक असर हुवा, लाहौर और अम्रतसर सहित देश ने अनेकों हिस्सों में लोग सड़कों पर उतर कर विरोध करने लगे. अंग्रेजी हुकूमत को अनेकों जगह धरा 144 लगाने पर मजबूर होना पड़ा. अंग्रेज हुकूमत ने भूख हड़ताल को तोड़ने के अनेकों प्रयास किये. तरह –तरह के षड्यंत्र किये गये, जबरजस्ती हुवी कि हड़ताल ख़त्म हो सके मगर सफल नहीं हो पाए. उस समय के अंगेज गवर्नर इरविन को अपना अवकास वापस लेना पड़ा उन्होंने जेल प्रशासन से बातचीत कर मामले को शांत करने की कोशिश की मगर वो भी असफल रहे. (lahore conspiracy case)

भूख हड़ताल का ख़त्म होना (Removal of hunger strike)

भगत सिंह का ये आन्दोलन अब तक विकराल रूप ले चुका था. पूरे देश में लोगों के मन में आक्रोश पैदा हो रहा था, वही अंग्रेजी हुकूमत की परेशानी भी बढती ही जा रही थी. अंग्रेजी हुकूमत ने फैसला किया कि भगत सिंह को दूसरे जेल में भेजा जाये. उन्हें लाहौर स्थित ब्रोस्ताल जेल भेज दिया गया. और भगत सिंह के ऊपर कानूनी कार्यवाही तेज कर दी गई. भगत सिंह ने भूख हड़ताल खत्म नही की. उनके स्वास्थ्य में लगातार भयानक गिरावट आ रही थी उन्हें स्टेचर से कोर्ट लाया जाता था. सरकार ने हड़ताल ख़त्म करने के इरादे से कैदियों को कुछ रियायते देने की घोषणा की, मगर प्रमुख मुद्दे “ राजनैतिक कैदी का दर्जा देने” से इंकार कर दिया.

इसी बीच एक साथी जीतेन्द्र नाथ दास की 63 दिन की भूख हड़ताल के बाद 13 सितम्बर 1929 को मौत हो गई. इस घटना ने पुरे देश में उबाल ला दिया, अगेजी सरकार की चूले हिलने लगी. जवाहरलाल नेहरु ने केंद्रीय असेम्बली में आवाज बुलंद की. मोह्मद्द आलम और गोपीचंद भार्गव ने पंजाब विधान-परिसद से इस्तीफा दे दिया. और अंततः 5 अक्टूबर 1929 को कांग्रेस पार्टी के एक प्रस्ताव और भगत सिंह के पिता जी के अनुरोध पर 116 दिन बाद सरदार भगत सिंह हड़ताल खत्म की.

कानूनी कार्यवाही और सम्बंधित तथ्य (Other Facets related to

Trial of Bhagat Singh)

भूख हड़ताल खत्म होते ही, उन्हें अब अपने केस पर ध्यान देना था. भगत सिंह का ही एक साथी जय गोपाल लाल अब कोर्ट में उनके खिलाफ बयानबाजी करने लगा था. यह देखकर बचाव पक्ष के एक सदस्य ने कोर्ट परिसर में ही जय गोपाल लाल के उपर चप्पल फेक दिया. मजिस्ट्रेट ने भगत सिंह और उनके साथियों को हाथ बांध कर कोर्ट में लाने का आदेश पारित कर दिया. जिसका भगत सिंह और अन्य साथियों ने विरोध किया, मगर मजिस्ट्रेट नहीं माना. भगत सिंह ने मजिस्ट्रेट को एक पत्र लिखकर कोर्ट में आने से मना कर दिया. मजिस्ट्रेट ने भगत सिंह और अन्य साथियों की उपस्थिति के बिना ही कोर्ट चलाने का आदेश दे दिया. यही बात भगत सिंह और अन्य साथियों के लिए दुर्भाग्यपूर्ण साबित हुवी. (Bhagat Singh Biography In Hindi)

फासी की सजा का ऐलान ( Death sentence of bhagat singh)

लगातार हो रहे विरोध प्रदर्शनों से डर कर गर्वनर ने डिफेंस ऑफ़ इंडिया एक्ट 1915 का हवाला देकर कानूनी कार्यवाही को तेज करने के बहाने से, पूरी कानूनी प्रक्रिया को छोटा कर दिया. तीन जजों का एक स्पेशल ट्रिब्यूनल बनाकर पूरी प्रक्रिया को उसके हवाले कर दिया. ये कोर्ट एक साजिश का हिस्सा था, लोगों ने इसका विरोध किया मगर गर्वनर नहीं माना. अंग्रेजी हुकूमत के कानूनों के मुताबिक भी यह ट्रिब्यूनल असंवेधानिक था. 31 अक्टूबर 1930 को इस ट्रिब्यूनल की अवधी ख़तम होनी थी क्योकि इसे ब्रिटिश असेम्बली में पास नहीं किया गया था. मगर 7 अक्टूबर 1930 को ही तीन जजों की इस असंवेधानिक पीठ ने 300 पेज सहित एक फैसला दिया. जिसके मुताबिक कोर्ट ने भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु को सांडर्स की हत्या का दोसी माना और तीनो क्रन्तिकारियों को फासी की सजा सुना दी गई.

आज जब में यह जीवनी लिख रहा हूँ, तो मैं उस समय में चला गया हूँ. कैसे लोग होंगे वो, कैसी होगी उनकी दीवानगी. फक्र होता है मुझे कि मैं सरदार भगत सिंह जैसे महान शहीदों के बनाये हुवे देश में पैदा हुवा. अपने इतने छोटे जीवन काल में जो कुछ प्रेरणा आपने दी, उसने न सिर्फ आजादी की मशाल को और उद्दिग्न किया बल्कि तब से अब तक इस देश को बढ़ने में मदद की. और आने वाले समय में भी आपके विचार राह दिखाते रहेंगे. ये भारत की धरती कृतज्ञ है ऐसे महान आत्माओं की. हम हजारों जन्म लेकर भी आपका कर्ज नहीं उतार सकते (Bhagat Singh Biography In Hindi) HindiWall

फांसी को टाले जाने हेतु प्रयास ( Gandi Ji on bhagat singh)

फांसी की सजा पर पुर्विचार हेतु कमेटी बनाई गई. भगत सिंह इस याचिका के विरोध में थे मगर लोगों के समझाने- बुझाने और संगठन के हित के लिए वो बाद में मान गये. कमेटी ने दावा किया कि जिस आर्डिनेंस के तहत ट्रिब्यूनल का गठन किया गया था वो आर्डिनेंस ही अवैध था. मगर अग्रेजों की हुकूमत नहीं मानी, और जबाब दिया कि गवर्नर के पास ट्रिब्यूनल बनाने का अधिकार है. इस तरह लन्दन में जज वाइसकाउंट डुनेडिन ने इस पुर्नार्विचार याचिका को ख़ारिज कर दिया.

चूकी 24 मार्च 1931 का दिन फांसी के लिए मुकर्रर था और पुनर्विचार याचिका ख़ारिज हो चुकी थी. उसके बाद, कांग्रेस पार्टी के तत्कालिक अध्यक्ष मदन मोहन मालवीय ने गवर्नर इरविन के पास 14 फ़रवरी 1931 को एक दया याचिका दायर कर अपील की कि गवर्नर अपने विशेस अधिकार के तहत फ़ासी की सजा को माफ़ कर दें. फासी की सजा माफ़ करवाने हेतु महात्मा गाँधी जी ने भी 17 फ़रवरी 1931 को गवर्नर इरविन से बात की, और 18 फ़रवरी को देश भर की आम जनता ने अपील की. 5 मार्च 1931 के दिन लन्दन में एक बार फिर से फ़ासी की सजा पर विचार करने के लिए गाँधी जी ने अपील की मगर वो भी गवर्नर इरविन द्वारा ठुकरा दी गई. (Bhagat singh biograraphy in hindi)

सनद रहे की यह सब कुछ महान शहीद–ऐ-आजम सरदार भगत सिंह की सहमति के बिना हो रहा था, क्योंकि भगत सिंह नहीं चाहते थे कि उनकी सजा माफ़ करने के लिए अपील की जाये”  (Bhagat Singh Biography In Hindi)

भगत सिंह के एक साथी भगवती चरण बोहरा द्वारा भी एक क्रन्तिकारी योजना बनाई गई थी. वो लाहौर जेल को बम से उड़ाकर जेल से भगत सिंह एवं साथियों को छुड़ा लाना चाहते थे. मगर इस योजना पर अमल करते हुवे बम बनाने की प्रक्रिया के दौरान बम के अचानक फट जाने के कारण भगवती चरण बोहरा शहीद हो गये और ये योजना भी निष्फल हो गई.

भगत सिंह, सुखदेव एवं राजगुरु को फांसी ( Date of Martyrdom of Bhagt singh, Rajguru, and Sukhdev )

23 मार्च 1931 को गाँधी जी ने एक और पत्र इरविन को लिखा मगर तब तक देर हो चुकी थी और एक महान देश के तीन महान क्रांतिकारियों को क्रूर साम्राज्यवादी तानाशाहों से बचाने के लिए किये गये सारे प्रयास विफल हो गये थे. मुकर्रर समय से 11 घंटे पहले ही 23 मार्च 1931 को शाम के समय 7.30 बजे भारत माँ के तीन महान सपूतों भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु को लाहौर जेल में फांसी दे दी गई. फांसी पर ले जाये जाने से पहले भगत सिंह लेनिन की जीवनी पढ़ रहे थे.

कहा जाता है कि जैसे ही जेल के अधिकारी उन्हें फांसी के लिए ले जाने आये तो उन्होंने कहा “ठहरिये पहले एक क्रन्तिकारी दूसरे क्रन्तिकारी से मिल तो ले ” फिर कुछ ही देर में किताब को छत की तरफ उछालते हुवे बोले- “ठीक है अब चलो”. फांसी की वेदी की तरफ जाते हुवे वो तीनों महान आत्माए मस्ती से एक साथ “मेरा रंग दे बसंती चोला” गा रहे थे. (Bhagat Singh Biography In Hindi)

फांसी के बाद की प्रतिक्रिया ( Post hanging reaction)

दुनिया भर के अख़बारों ने इस खबर को प्रमुखता से छापा. भारत में जगह- जगह हिंसात्मक प्रतिक्रिया हुवी. अंग्रेजी हुकूमत को इस वक्त पहली बार ये महसूस हुवा कि अब ज्यादा दिन तक हिन्दुस्तानियों पर शासन करना संभव नहीं है. यहाँ तक कि कुछ संगठनों ने लाहौर में हो रहे कांग्रेस के वार्षिक अधिवेसन में हिस्सा लेने पहुचे महात्मा गाँधी जी पर क्रांतिकारियों को बचाने के लिए प्रयास न करने के आरोप लगाये, उनके खिलाफ नारेबाजी की, काले झंडे दिखाए और काले फूलों की माला पेश की. कांग्रेस पार्टी के करांची अधिवेसन में भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव की शहादत को नमन किया गया. तीनों क्रांतिकारियों के परिवार और देश के प्रति सवेदना ज्ञापित की गई. अंग्रेजी हुकूमत को कड़ा सन्देश देकर ये जताया गया कि इस तरह के कर्त्यों से ये देश डरने वाला नहीं है. (Bhagat singh ka jiwan parichay)

भगत सिंह का देश एवं समाज के लिए योगदान ( Bhagat singh’s contribution to the country and society )

यद्दपि जीवनदाता ने भगत सिंह को इस संसार मैं बहुत कम समय दिया, फिर भी भगत सिंह हम लोगों के लिए बहुत कुछ छोड़ कर गये है. उनके जेल में बिताये गये दिनों में लिखे खतों और लेखों से उनके विचारों का अंदाजा लगाया जा सकता है. उन्होंने हिंदुस्तान में फैली तमाम कुरीतियों और असामनता पर कड़े प्रहार किये थे. जातिवाद, धर्मवाद, भाषावाद और छेत्रवाद जैसे तमाम विवादों को वो सामाजिक राजनैतिक और आर्थिक उन्नति के लिए घातक मानते थे. आर्थिक और सामाजिक तौर कमजोर वर्गों के खिलाफ हो रहे अत्याचारों को भी वो अग्रेजों के अत्याचारों के बराबर का दर्जा देते थे. (Bhagat Singh Biography In Hindi) by HindiWall


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