माँ वैष्णो देवी | इतिहास | कैसे पहुचें | MATA VAISHNO DEVI MANDIR | HISTORY AND HOW TO REACH GUIDE

Vaishno Devi Mandir Yatra | हिन्दू धर्म में माँ वैष्णो देवी मंदिर एक महत्वपूर्ण तीर्थ स्थल है. वैष्णो देवी मंदिर में लाखों लोग हर साल दर्शन करने आते है. पूरे वर्ष न सिर्फ हिंदुस्तान से बल्कि अन्य देशों से भी तीर्थयात्री इस मंदिर की यात्रा करके अपनी मनोकामना पूर्ण करते है. ऊँची पहाड़ी पर स्थित यह मंदिर हिंदुस्तान के करोड़ों लोगों की आस्था का केंद्र है. माता वैष्णो देवी को “वैष्णवी माता” और “माता रानी” के नाम से भी जाना जाता है. हमारा देश मंदिर और तीर्थस्थलों का देश है. पूरे देश में अनेकों महान और विश्व-विख्यात मंदिर है, मगर जम्मू एवं कश्मीर राज्य के त्रिकुट पर्वत पर स्थिति माता रानी का यह मंदिर अपने आप में खास है. तीर्थयात्रियों की संख्या के आधार पर माँ वैष्णो देवी मंदिर भारतवर्ष के सबसे बड़े धार्मिक तीर्थस्थलों में शामिल है.

वैष्णो देवी मंदिर (Vaishno Devi Mandir Darshan)

(Vaishno Devi Mandir) – “माँ वैष्णो देवी मंदिर” भारत के जम्मू कश्मीर राज्य के रियासी जिले में स्थित कटरा नगर से लगभग 13 किलोमीटर दूर, समुद्र तल से 1550 मीटर ऊँची “त्रिकुट” नामक पहाड़ी पर अवस्थित है. कटरा से लगभग 13 किलोमीटर की यात्रा के बाद एक गुफा में विराजमान माता वैष्णो देवी का यह निवास स्थान भारतवर्ष के 108 शक्ति पीठों में से एक है. माता रानी के मुख्य मंदिर को भवन के नाम से भी जाना जाता है. भवन में स्थित गुफा में माता रानी एक पिंड के रूप में विराजमान है. यह पिंड माँ काली (दाई तरफ), माँ सरस्वती (मध्य में) और माँ लक्ष्मी (बाई तरफ) का सम्मलित रूप है. इन तीनों रूपों से बने इस पिंड को “माँ वैष्णो देवी” का रूप कहा जाता है. मुख्य मंदिर में इन तीन पिंडों के आलावा जम्मू कश्मीर के पूर्व नरेशों और भक्तों द्वारा स्थापित मुर्तिया और यंत्र आदि मौजूद है.

माता वैष्णो देवी मंदिर का पैराणिक इतिहास

(History of Vaishno Devi Mandir In Hindi)

(Mata Vaishno Devi Mandir In Hindi)  पैराणिक हिन्दू धर्मग्रथों के अनुसार, संसार में धर्म की हानि होने  और अधर्म का का प्रभाव बढ़ने के कारण आदिशक्ति ने त्रेतायुग में ‘सत’, ‘रज’ और ‘तम’ के तीन रूपों महा-सरस्वती, महा-लक्ष्मी, और महा-दुर्गा के सामूहिक बल से धर्म की रक्षा के लिए एक कन्या प्रकट की. कहा जाता है कि माँ वैष्णो देवी ने इसी कन्या के रूप में दक्षिण भारत के समुंद्री तट पर स्थित रामेश्वरम में एक संतानहीन परिवार के घर में जन्म लिया. माँ वैष्णो देवी के बचपन का नाम त्रिकुटा था. भगवान् विष्णु के वंश में जन्म लेने के कारण उनका नाम वैष्णो पड़ा. रत्नाकर सागर को उनका लौकिक पिता माना जाता है, कहा जाता है कि रत्नाकर सागर ने देवी बालिका के जन्म से पहले एक वचन लिया था कि वो अपनी होने वाली संतान की इच्छाओं का सम्मान करेंगे और कभी भी उनके खिलाप नहीं होंगे.

जब त्रिकुटा सिर्फ 9 वर्ष की थी तब उन्होंने अपने लौकिक पिता श्री रत्नाकर सागर के सम्मुख समुद्र किनारे जाकर तपस्या करने की इच्छा जताई. इस तपस्या का उद्देश्य भगवान श्रीराम को पति रूप में प्राप्त करना था. श्री रत्नाकर सागर ने अपने वचन के वसीभूत उन्हें आज्ञा दे दी और पिता की आज्ञा पाकर बालिका देवी त्रिकुटा समुद्र किनारे भगवत तपस्या में लींन हो गई. (Vaishno Devi Ka Mandir)

इसी बीच एक दिन विष्णु अवतार “भगवान श्री राम” माता सीता की ख़ोज करते हुवे समुद्र किनारे पहुचे. उनकी द्रष्टि तपस्या में लीन इस दिव्य बालिका पर पड़ी. देवी त्रिकुटा ने मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान् श्री राम से कहा कि वो उनको अपना पति मान चुकी है. यह सुनकर भगवान् श्री राम ने कहा कि इस अवतार में उनकी धर्मपत्नी सिर्फ “सीता जी” ही है, और वो उनके प्रति ही पति के रूप में पूर्ण निष्ठावान है.

भगवान् श्रीराम ने देवी त्रिकुटा को वचन दिया और कहा कि वो कलयुग में कल्कि अवतार लेकर उनसे जरूर विवाह करेंगे. तब तक वो उत्तर भारत में स्थित माणिक पहाड़ियों के बीच त्रिकुट नामक पर्वत में तपस्या करे और भक्तों के कष्टों का नाश कर जगत कल्याण करती रहें. भगवन श्री राम ने कहा एसा करने से पूरी दुनिया में उनकी पूजा की जाएगी तथा वो “माता वैष्णो देवी” के नाम से विश्व- विख्यात हो जाएँगी.

माँ वैष्णो देवी | कथाएं (Vaishno Devi Story In Hindi)

ब्राह्मण श्रीधर कथा ( Story Of Pandit Sridhar | Vaishno Devi Mandir)- कहा जाता है कि श्रीधर नाम का एक बहुत ही गरीब ब्राहमण माँ वैष्णो देवी का बड़ा भक्त था. श्रीधर का परिवार “वर्तमान के कटरा नगर” से लगभग 2 किलोमीटर की दूरी पर स्थित “हंसली” नामक गाँव में रहता था. एक बार नवरात्री में कन्या पूजन के अवसर पर माँ वैष्णो देवी पंडित श्रीधर के घर आ गई. पूजा – पाठ ख़तम होने के पश्चात अन्य लोग तो चले गये मगर कन्या रूपी माँ वैष्णो देवी वही रुकी रही. उन्होंने पंडित श्रीधर से भंडारे का आयोजन करने के लिए कहा. पंडित श्रीधर ने भंडारा करने के लिए निकटतम गाँवों के लोगों को आमंत्रित किया साथ ही गुरु गोरखनाथ और उनके शिष्य भैरवनाथ को भी इस आयोजन में आमंत्रित किया गया.

 गाँव के लोगों को पंडित श्रीधर के इस आयोजन के बारे में शंका होने लगी कि ये गरीब ब्राह्मण आखिर कैसे भंडारे का आयोजन करेगा. और ये दिव्य कन्या आखिर क्यों भंडारे का आयोजन करना चाहती है. भैरवनाथ ने पंडित श्रीधर को बहुत डराया और कहा कि अगर भंडारे के आयोजन में कोई कमी अथवा त्रुटी हुवी तो उसे गंभीर हानि हो सकती है. भैरवनाथ की बातों को सुनकर तथा गाँव के लोगों के वर्ताव को देख कर पंडित श्रीधर बहुत निराश हुवे और चिंता में डूब गए. (Maa Vaishno Devi Temple)

 इसी बीच भंडारे के समय माँ वैष्णो देवी उसी दिव्य बालिका के रूप में पंडित श्रीधर के सम्मुख पुनः प्रकट हुवी और कहा कि उन्हें निराश होने की बिलकुल जरुरत नहीं है. भंडारे की सारी व्यवस्था हो चुकी है, लोगों को आप अपनी छोटी सी कुटिया में बिठा दीजिये. इतना बोलकर वो कन्या एक दिव्य बर्तन से खुद ही लोगों को खाना परोसने लगी. इस तरह माता रानी की कृपा से भंडारे का आयोजन सम्मानपूर्वक संपन्न हो गया. यह सब देखने के बाद पंडित श्रीधर माँ वैष्णो देवी के और भी परम भक्त हो गये. उन्होंने त्रिकुट पर्वत स्थित उस गुफा में पहुच कर देवी माँ की पूजा अर्चना में ही अपना जीवन लगा दिया. माना जाता है कि माता वैष्णो देवी मंदिर में पूजा-अर्चना करने वाले पुजारी और पंडित श्रीधर के ही वंसज है.

भैरवनाथ की प्रसिद्द कथा (Story Of Bhaironath | Vaishno Devi Mandir) – भैरवनाथ जब पंडित श्रीधर द्वारा आयोजित भंडारे में पहुचा तो उनसे भंडारे के पवित्र भोजन को ग्रहण करने से मना कर दिया और मांस – मदिरा की मांग करने लगा. पंडित श्रीधर ने इस बात को लेकर असहमति जताई. मगर भैरवनाथ नहीं माना और आपनी मांग पर अडिग रहा, यह सब देखकर भंडारे में पहुची कन्या रूपी माँ वैष्णो देवी ने भी भैरवनाथ को उसके हठ को लेकर समझाने- बुझाने की बहुत कोसिश की, मगर भैरवनाथ ने एक न सुनी. उल्टा वो उस कन्यारुपी “माँ वैष्णो देवी” के पीछे भागने लगा. यह देख कर भंडारे में आई कन्या रूपी माता रानी को भैरोनाथ की नियत का आभास हो गया और वो हवा का रूप धरकर “त्रिकुट पर्वत” की तरफ चलीं गईं.

भैरवनाथ माँ वैष्णो देवी का पीछा करते हुवे गुफा के द्वार तक पहुच गया. यह देख माँ वैष्णो देवी ने हनुमान को बुलाकर कहा कि में नौ महीने तक इस गुफा के अन्दर तपस्या करुँगी तब तक तुम भैरोनाथ को गुफा में प्रवेश मत करने देना. भेरोनाथ गुफा के बाहर हनुमान जी से युद्ध करने लगा, यह देखने पर की हनुमान जी युद्ध करते- करते थक गये माता रानी ने काली का रूप धर त्रिकुट पर्वत में ही भैरवनाथ का संहार कर दिया. भैरोनाथ का सिर धड से अलग होकर, अर्धक्वारी गुफा से लगभग 7 कीलोमीटर तथा मुख्य मंदिर से 1.5 किलोमीटर दूर भैरो घाटी में जाकर गिरा.

मरते वक्त भैरोनाथ द्वारा क्षमा याचना करने पर माता रानी ने उसे वरदान दिया कि “जो भी इन्सान मेरे दर्शन को आएगा उसका दर्शन तभी पूर्ण होगा जब वो वो भैरवनाथ मंदिर के दर्शन करेगा”. तब से अब तक जो भी भक्त माँ वैष्णो देवी के दर्शन के लिए जाते है, भैरवनाथ मंदिर के दर्शन भी जरूर करते है.

मंदिर के अन्य दर्शनीय स्थल

  • बाणगंगा नदी (Banganga River | Mata Vaishno Devi Mandir) बाणगंगा नदी कटरा से 1 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है. कहा जाता है की हनुमान जी को एक बार प्यास लगने पर माता रानी ने अपने धनुष से पहाड़ पर बाण चलाकर एक जलधारा पैदा की थी. उसी पवित्र जलधारा को आज बाणगंगा के नाम से जाना जाता है.
  • चरण पादुका (Charan Paduka | Vaishno Devi Mandir) बाणगंगा से लगभग 1.5 किलोमीटर की दूरी तय करने के बाद अर्धक्वांरी से 3.5 किलोमीटर  पहले ही एक शिला पर  माता रानी के पवित्र चरणों के निशान है जिन्हें चरण पादुका कहा जाता है. चरण पादुका के दर्शन कर भक्त माता रानी को प्रणाम करते है और आशीर्वाद लेते है . चूकी “चरण पादुका” यात्रा के रस्ते में ही है इसलिए  दर्शन में भी ज्यादा समय नहीं लगता. चरण पादुका के पास ही “माँ वैष्णो देवी श्राइन बोर्ड” की मेडिकल यूनिट भी है, जो आते-जाते भक्तों से सेवा के लिए हमेशा तैनात रहती है.
  • माँ वैष्णो देवी “अर्धक्वारी गुफा” (Ardhkuwari Cave | Vaishno Devi Mandir Yatra) बाणगंगा से लगभग 6 किलोमीटर दूरी पर पवित्र अर्धक्वारी गुफा है. अर्धक्वारी के बारे में मान्यता है कि, इस गुफा में माँ वैष्णो देवी ने 9 महीने तक तपस्या की थी. हनुमान जी ने इसी गुफा के बाहर नौ महीने तक माँ वैष्णो देवी की रक्षा की और भैरवनाथ को अन्दर नहीं आने दिया.
  • वैष्णो देवी स्थित भैरोनाथ मंदिर ( Bhairavnath Mandir | Maa Vaishno Devi Mandir) माता रानी ने महा शक्तिशाली काली का रूप धर कर जब भैरवनाथ का वध किया तो भैरोनाथ का मस्तक धड से अलग होकर पवित्र मंदिर से 1.5 किलोमीटर दूर भैरवघाटी नामक स्थान पर जाकर गिरा था. इसी स्थान पर भैरव नाथ का मंदिर बना है.

वैष्णो देवी मंदिर से संबंधित मान्यताएं-

(Beliefs Related Vaishno Devi Mandir) 

  • वैष्णो देवी से संबंधित अनेकों मान्यताएँ है. बाणगंगा के बारे में कहा जाता है कि हनुमान जी की प्यास बुझाने के लिए माता रानी ने बाणगंगा नदी को अवतरित किया और बाद में  उसमे अपने केश भी धोये थे. इसीलिए बाणगंगा के जल को बहुत पवित्र माना जाता है. ये मान्यता है कि जो भी भक्त बाणगंगा नदी के पवित्र जल से स्नान करता है उसकी सारी व्याधियां ख़त्म हो जाती हैं.
  • माँ वैष्णो देवी के दर्शन करने के बाद भैरवनाथ के दर्शन को जरुरी माना जाता है. कथानुसार माँ वैष्णो देवी ने स्वयं भैरवनाथ को ये वरदान दिया था कि जो भी भक्त मेरे दर्शन करने आएगा वो भैरोनाथ के दर्शन भी जरूर  करेगा. मान्यता है कि भैरोनाथ के दर्शन के बिना माँ वैष्णो देवी के दर्शन पूर्ण नहीं होते.
माता वैष्णो देवी ने भगवान् श्रीराम द्वारा रावण के विरुद्ध युद्ध में “श्रीराम सेना” की विजय हेतु नवरात्रों का आयोजन भी किया था. इसी सन्दर्भ को लेकर आज भी वैष्णो देवी मंदिर में नवरात्रों के समय “रामायण पाठ” का आयोजन किया जाता है.

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“वैष्णो देवी मंदिर की यात्रा ” (Vaishno Devi Mandir Yatra)

(How To Reach Vaishno Devi) कहा जाता है कि माता रानी के बुलावे पर भक्त बड़ी आसानी से माँ वैष्णो देवी के मंदिर पहुच जाते है. भारतवर्ष के इस महत्वपूर्ण तीर्थस्थल तक पहुचने के लिए आपको यात्रा के सबसे पहले पड़ाव “जम्मू एवं कश्मीर” राज्य के “जम्मू” शहर पहुचना होगा.

vaishno devi mandir yatra
  • कैसे पहुचे जम्मू (How To Reach Jammu | Vaishno Devi Mandir) जम्मू पहुचने के लिए उत्तर भारत के लगभग हर प्रमुख शहर से ट्रेन, बस या फिर टैक्सी के द्वारा यात्रा की शुरुवात की जा सकती है. देश के बड़े शहरों जैसे दिल्ली, मुंबई, चंडीगढ़ आदि से हवाई मार्ग द्वारा भी जम्मू शहर पहुचा जा सकता है. गर्मियों के मौसम यात्रियों की संख्या ज्यादा होने के कारण भारतीय रेलवे द्वारा प्रतिवर्ष कुछ विशेष ट्रेनें दिल्ली से जम्मू के लिए चलाई जाती है. जम्मू एवं कश्मीर परिवहन द्वारा भी विशेस बसों का प्रचालन किया जाता है.
  • जम्मू से कटरा तक की यात्रा- (Jammu To Katra | Vaishno Devi Mandir) वैष्णो देवी मंदिर की यात्रा का दूसरा पड़ाव जम्मू का कटरा क़स्बा है. जम्मू से कटरा तक की दूरी 50 किलोमीटर है, जिसे तय करने में 2 घंटे लगते है. जम्मू रेलवे स्टेशन से कटरा के लिए विशेस ट्रेन भी जाती है साथ ही जे & के परिवहन की बसों या फिर टैक्सी और निजी वाहन से भी कटरा पहुचा जा सकता है. जम्मू शहर के लगभग हर स्थान से आप टैक्सी किराये पर लेकर कटरा तक की यात्रा कर सकते है. अगर आप हवाई मार्ग से जम्मू एयरपोर्ट पहुचते है तो आपको जम्मू एअरपोर्ट पर जम्मू एवं कश्मीर परिवहन की बस या फिर टैक्सी मिल जाएगी जिसके जरिये आप कटरा पहुच सकते है. अगर आप अपना निजी वाहन लेकर चल रहे है तो भी आप कटरा तक आसानी से निजी वाहन से यात्रा कर सकते है. निजी वाहन से जाने वाले यात्री चाहे तो कुंजवनी से बाई-पास ले सकते है.
  • कटरा से माँ वैष्णो देवी मंदिर की यात्रा (Katra to Vaishno Devi Mandir Yatra) कटरा से माता रानी के मंदिर तक पहुचने के लिए की जाने वाली यात्रा ही माता वैष्णो देवी मंदिर की वास्तविक यात्रा है. कटरा से आगे के यात्रा के लिए यात्रियों को यात्रा पर्ची  बनवानी पड़ती है. पर्ची लेने के बाद 3 घंटे के अन्दर ही आपको बाणगंगा स्थित जाँच केंद्र पहुचना होता है. यहाँ  पर सामान की जाँच के बाद ही आगे की यात्रा शुरू होती है.

याद रहे कि पर्ची लेने के 3 घंटे के अन्तराल में ही आप जाँच केंद्र पहुच जाये वरना पर्ची की वैधता समाप्त मानी जाती है. हो सके तो यात्रा प्रारंभ करने के कुछ समय पहले ही या अपनी सुविधानुसार पर्ची लें. ताकि निश्चित अवधि से पहले- पहले जाँच केंद्र पहुच कर यात्रा शुरू कर सकें. इसी यात्रा के दौरान अनेक जगहों पर क्लॉक रूम की सुविधा उपलब्ध है, यात्रियों को निश्चित शुल्क देकर अपना सामान क्लॉक रूम में जमा करवा देना चाहिए ताकि यात्रा करने में आसानी हो. यात्री दिन के समय कटरा में ही किसी धर्मशाला या फिर होटल में विश्राम कर सायं के समय यात्रा आरम्भ करते है. अधिकतर यात्री रात्रि के समय ही इस यात्रा को सुविधाजनक मानते है.

यात्रा मार्ग चयन-

  1. यात्रा का मुख्य मार्ग. (Main Route Of Vaishno Devi Mandir) माँ वैष्णो देवी श्राइन बोर्ड के हाथों मंदिर देखभाल की जिम्मेदारी आने के बाद यात्रा मार्ग में काफी सुधार किये गये है. मुख्य रस्ते का काफी हिस्से को तीन शेड से कवर किया गया है ताकि बारिश के मौसम में यात्रियों को परेशानी का समाना न करना पड़े. मुख्य मार्ग पर जगह- जगह पानी के नल और वाटर कूलर लगे हुवे है. पूरे रस्ते अनेक जगह टॉयलेट और वाशरूम इत्यादि की अच्छी सुविधा है. मुख्य मार्ग में रात्रि के समय में रौशनी बनी रहे इसके लिए उच्च दबाव की हेलोजन लाइट की व्यवस्था है.
  2. वैकल्पिक मार्ग ( Alternative Route To Vaishno Devi Mandir) लगातार यात्रियों के बढ़ते दबाव और मुख्य मार्ग की कठनाइयों को देखते हुवे, माँ वैष्णो देवी श्राइन बोर्ड ने 1990 में एक वैकल्पिक रास्ते का निर्माण कार्य शुरू किया, ये रास्ता 1999 में यात्रियों के लिए खोल दिया गया. नए रास्ता मुख्य मार्ग से 500 मीटर छोटा है, साथ ही इस रस्ते में घोड़े इत्यादि के न चलने के कारण यात्रियों द्वारा काफी पसंद किया जाता है. नया रास्ता अर्धक्वारी से थोडा पहले “इन्द्रप्रस्थ व्यू पॉइंट” से शुरू होता है और माता रानी के मुख्य मंदिर “भवन” तक जाता है. नया रास्ता पुराने की अपेक्षा अधिक चौड़ा और चलने के लिए आसान है. रस्ते में हर जरुरी सुविधा जैसे कि पानी और टॉयलेट इत्यादि की अच्छी सुविधा मौजूद है. जगह जगह पर चाय, काफी और रिफ्रेशमेंट के लिए छोटे- बड़े स्टाल्स भी इस रस्ते में मौजूद है. अर्धक्वारी से महल तक के लिए बैटरी चालित गाड़िया मौजूद होती है. हालाँकि अधिक भीड़ होने पर जल्दी इन गाड़ियों का उपलब्ध हो पाना थोडा मुस्किल जरूर होता है. मगर एडवांस बुकिंग आपकी यात्रा को सुविधा-जनक बना देगी
पैदल यात्रा करने वालों के लिए कटरा से माँ वैष्णो देवी की वास्तविक यात्रा आरम्भ होती है. खड़ी पहाड़ी चढ़ते हुवे यात्री धीरे-धीरे विश्राम करते करते हुवे माता रानी के जयकारों के साथ आगे बढ़ते जाते है. लगभग 6 किलोमीटर की यात्रा तय करने के बाद अर्धक्वारी गुफा आ जाती है. भीड़ कम होने की स्थिति में, यात्री मंदिर को जाते हुवे ही अर्धक्वारी गुफा के दर्शन कर सकते है. भीड़ ज्यादा होने पर कुछ यात्री वापसी के समय भी अर्धक्वारी गुफा में माता रानी के दर्शन करते है. अर्धक्वारी से लगभग 6 किलोमीटर की यात्रा के बाद यात्री सांझीछत नामक स्थान पर पहुचते है. कुछ ही दूरी की यात्रा तय करने के बाद भवन में प्रवेश की प्रक्रिया शुरू हो जाती है.

भवन में पहुच जाने पर  ( At Bhawan | Vaishno Devi Mandir)भवन यानि की  माता वैष्णो देवी के मुख्य मंदिर में प्रवेश के लिए यात्रियों को अलग- अलग ग्रुप में बाँट दिया जाता है. ग्रुप के हिसाब से ही लाइन में लग कर मुख्य मंदिर में प्रवेश करना होता है.  मंदिर में माता वैष्णो देवी के दर्शन के उपरांत यात्री मंदिर से लगभग 3 किलोमीटर दूर स्थित भेरोनाथ मंदिर जाते है और वापस आते हुवे अर्धक्वारी के दर्शन करते हुवे कटरा आ जाते है.

कटरा से मंदिर पहुचने के लिए यात्रा के साधन (Helicopter Service | Vaishno Devi Mandir) 

जो यात्री कटरा से पैदल यात्रा नहीं कर सकते या पैदल नहीं जाना चाहते वो हेलीकाप्टर सेवा का लाभ उठा सकते है. हेलीकाप्टर से यात्रा करना समय के लिहाज से ठीक है. 1005 रूपये खर्च कर आप सांझी छत तक हेलीकाप्टर से यात्रा कर सकते है . आप आने और जाने के लिए हेलीकाप्टर सेवा का लाभ ले सकते है. इसके अलावा घोड़े और पोर्टरों की सहायता से भी माता वैष्णो देवी दर्शन यात्रा तय की जा सकती है. अर्धक्वारी से बैटरी चालित छोटे वाहन से भी भवन के नजदीक तक यात्रा की जा सकती है. हेलोकोप्टर सेवा के बारे में ज्यादा जानकारी के लिए आप  माँ वैष्णो देवी श्राइन बोर्ड की वेबसाइट देखें.

माँ वैष्णो देवी “यात्रियों के विश्राम के लिए विकल्प (Hotels Near Vaishno Devi Mandir) 

माँ वैष्णो देवी ट्रस्ट ने यात्रियों को परेशानियों से बचाने के लिए अनोको इंतजाम किये है. रुकने के लिए धर्मशालाओं की व्यवस्था भी कटरा से लेकर भवन तक अनेकों जगह पर है. इन धर्मशालाओं में रूककर यात्री विश्राम कर सकते है. इसके अलावा निजी होटलों में भी रुकने की अच्छी व्यवस्था है. इन होटल और धर्मशालाओं की पूर्व बुकिंग करना बेहतर कदम हो सकता है. यात्री चाहे तो जम्मू आकर भी बेहतरीन निजी होटलों में रुक सकते है.

वैष्णो देवी मंदिर के आस- पास अन्य दर्शनीय स्थल (Other Tourist Places Near Vaishno Devi Mandir)

माँ वैष्णो देवी के दर्शन करते हुवे यात्री जम्मू एवं कश्मीर के अन्य धार्मिक और पर्यटक स्थलों पर घूमने की प्लानिंग भी कर सकते है. माँ वैष्णो देवी के नजदीक ही अनेको पर्यटक स्थल जेसे कि जम्मू स्थित रघुनाथ मंदिर, अमर महल आदि स्थान घूमने के लिहाज से बेहतरीन है. यात्री यदि चाहे तो कुछ अधिक दूरी तय कर पर्यटक स्थल “पथनी टॉप” भी घूमने जा सकते है. पथनी टॉप जम्मू से लगभग 110 किलोमीटर की दूरी पर जम्मू एवं कश्मीर रास्ट्रीय राजमार्ग पर स्थित है. इसके अलावा कश्मीर की खूबसूरत वादियों में स्थित पर्यटक स्थल जैसे कि गुलमर्ग, सोनमर्ग आदि की यात्रा का प्लान भी माँ वैष्णो देवी मंदिर की यात्रा के साथ बनाया जा सकता है.

वैष्णो देवी यात्रा में ध्यान देने योग्य बातें

(Things To Note While Visiting Vaishno Devi Mandir)

  • बल्ड प्रेशर के मरीजों को पैदल यात्रा से परहेज करना चाहिए. वो हेलीकाप्टर या फिर घोड़े और  पोर्टर आदि की सहायता ले कर यात्रा कर सकते है.
  •  यात्रा में अधिक चढ़ाई होने के कारण आपको जी मचलाने सम्बंधित परेशानी आ सकती है. इसलिए पानी और कुछ दवाइयों का साथ होना लाभदायक हो सकता है.
  • यात्रियों को अपने सभी साथियों के साथ मिलकर यात्रा करनी चाहिए.
  • यात्रा के दौरान बच्चों का विशेष ध्यान रखने की जरुरत है.
  • बहुत ज्यादा उम्रदराज यात्रियों को यात्रा के लिए पैदल मार्ग के बजाय अन्य साधनों का इस्तेमाल करना आरामदायक होगा.
  • यात्रियों के यात्रा के दौरान कम से कम सामान साथ में रखना चाहिए. यात्री क्लॉक रूम में अपना सामान जमा करने के उपरांत ही यात्रा आरम्भ करे तो बेहतर होगा.
  • यात्रा के लिए गर्मियों का मौसम ही उचित है. क्योकि सर्दियों में तापमान बहुत कम होता है तथा बरसात में चट्टानों के खिसक जाने का डर बना रहता है.
  • पहाड़ी में खड़ी यात्रा में दौरान छड़ी आपकी यात्रा को सुगम बना सकती है.
  • यात्रा के लिए ट्रेकिंग शूज का इस्तेमाल करना आरामदायक साबित होगा
  • यात्रा का उत्साह और जय माता दी बोलते रहने से यात्रा करना थकन भरा नहीं होगा.

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अद्वैत आश्रम मायावती संछिप्त जानकारी
ADVAITA ASHRAMA MAYAWATI

अद्द्वैत आश्रम मायावती,  रामकृष्ण मठ की एक शाखा है. इसकी स्थापना 19 मार्च 1999 को स्वामी विवेकानंदा की प्रेरणा से उनके शिष्य स्वामी स्वरूपानंद सहित उनके अंग्रेज शिष्य दम्पति “कैप्टन जे एच सेविअर” और पत्नी सी एलिजाबेथ सेवियर ने मिलकर की थी. सेवियर दंपत्ति इंग्लेंड में अपना घर और जमीन बेचकर स्वामी विवेकानंद के साथ भारत आ गये और लोहाघाट के मायावती में अद्द्वैत आश्रम की स्थापना की. कैप्टन जे एच सेविअर भारत आने के बाद पूरे समय अपनी पत्नी सहित अद्द्वैत वेदांत के प्रचार प्रसार और “प्रबुद्द भारत” नामक मासिक पत्रिका के कार्य में लगे रहे. बहुत अल्प समय में ही 28 अक्टूबर 1900 को कैप्टन जे एच सेविअर का देहांत हो गया.

शिष्य जे एच सेविअर के देहांत हो जाने के उपरांत स्वामी विवेकानंद, श्रीमती सी एलिजाबेथ सेवियर को सांत्वना देने के लिए 3 जनवरी 1901 के दिन मायावती आश्रम आये थे. स्वामी जी यहाँ लगभग 15 दिन यानि कि  18 जनवरी 1901 तक रुके थे.

स्वामी विवेकानंद चाहते थे कि अद्वैत आश्रम मायावती में किसी मूर्ति या तस्वीर की पूजा न की जाये. इसलिए उनकी आज्ञा अनुसार यहाँ कोई पूजा पाठ नहीं किया जाता. हालाँकि सायं के समय राम-धुन संक्रीतन जरूर होता है.

समाज कल्याण के कार्य
SOCIAL WORK AT ADVAITA ASHRAMA MAYAWATI

सन 1901 में यहाँ एक छोटे से पुस्तकालय की स्थापना की गई थी जिसमे स्वामी विवेकानंद के जीवन, विचार, दर्शन, आध्यात्म और योग सहित अनेकों विषयों पर लिखी गई किताबों का संकलन है. मायावती आश्रम में एक धर्माथ अस्पताल की स्थापना भी सन 1903 में की गई थी. जिसमे आस पास के गरीब लोगों को मुफ्त चिकित्सा सहायता की जाती है. यह रुग्णालय लोहाघाट, चम्पावत के ग्रामीणों के लिए आज किसी वरदान से कम नहीं है. देश-विदेश से बेहतरीन चिकित्सक यहाँ सेवाकार्य के लिए आते है. जिसका खूब फायदा यहाँ के लोगों को होता है. आश्रम में, बाहर से आये हुवे अथितियों के रुकने के लिए धर्मशाला की सुविधा भी है.

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HISTORY OF MAYAWATI ASHRAMA

अद्दवैत आश्रम की स्थापना के बारे में जानने के लिए हमें आश्रम की स्थापना के समय से कुछ वर्ष पीछे जाकर स्वामी विवेकानंद के जीवन वृतांत को समझना होगा.

1895 स्वामी विवेकानंद इंग्लेंड में थे तो वही के एक निवासी जेम्स हेनरी सेवियर आपनी पत्नी सी एलिजाबेथ सेविएर के साथ स्वामी जी से मिलने आये. जेम्स हेनरी तथा उनकी पत्नी सी एलिजाबेथ हेनरी की अध्यात्म में काफी रूचि थी और वो स्वामी विवेकानंद के दर्शन और व्याख्यान से काफी प्रभावित हुवे. 1896 में जब स्वामी जी स्विट्जर्लैंड, जर्मनी और इटली की यात्रा पर गये तो हेनरी दम्पत्ति भी स्वामी विवेकानंद के साथ चल दिए. इसी बीच जब स्वामी विवेकानंद और हेनरी दम्पत्ति ऐल्प्स पर्वत की यात्रा पर थे तब उन्होंने भारत के हिमालयन राज्य में संतो के एकांतवास और वेदांत के अध्यन के लिए एक आश्रम बनाने की इच्छा व्यक्त की.

सेवियर दम्पति और मायावती आश्रम
SEVIOAR FAMILY AND ADVAITA ASHRAMA MAYAWATI

इसी कार्य को सम्पन करने के लिए सेवियर दम्पति ने स्वामी विवेकनद से भारत आने की इच्छा वक्त की. स्वामी जी की आज्ञा पाकर दिसम्बर 1896 को सेवियर दम्पति स्वामी विवेकानंद के साथ भारत के लिए रवाना हो गये फ़रवरी 1897 को वो मद्रास पहुचे. स्वामी विवेकानंद जी कलकत्ता चले गये और सेवियर दम्पति अल्मोड़ा आ गये. अल्मोड़ा आ कर उन्होंने एक बंगला किराये पर लिया जहा वो दो वर्षों तक ठहरे. इस दौरान उन्होंने आश्रम के लिए उपयुक्त स्थान की खोज जारी रखी और अंततः जुलाई 1898 में लोहाघाट के नजदीक मायावती नामक स्थान जो की एक चाय बगान था का चुनाव किया और इसे आश्रम के लिये खरीद लिया गया.

mayawati ashrama

स्वामी स्वरूपानंद की सहायता से अद्वैत आश्रम मायावती 19 मार्च 1899 को बनकर तैयार हो गया. स्वामी स्वरूपानंद इस आश्रम के प्रथम प्रमुख बने. चेन्नई मठ से निकलने वाली प्रबुद्ध भारत नामक पत्रिका के संपादक की अचानक मुर्त्यु के बाद पत्रिका के संपादन और प्रकाशन की जिम्मेदारी भी मायावती आश्रम के पास आ गई. स्वामी स्वरूपानन्द जी ने प्रबुद्ध भारत के संपादक का कार्यभार संभाला और मायावती आश्रम में ही इसके प्रकाशन का कार्य भी किया जाने लगा.

स्वामी विवेकनादं का अद्वैत आश्रम मायावती को पत्र
LATTER TO MAYAWATI ASHRAMA

आश्रम के उद्घाटन के अवसर पर मार्च 1899 को स्वामी विवेकानंद ने एक पत्र भेजा कर कहा था कि “सत्य को आजादी के साथ फैलने देने, मानव के जीवन को ऊँचा उठाने और मानव मात्र के कल्याण के लिए हम अद्वैत आश्रम की शुरुवात करते है. हम उम्मीद करते है की अद्वैत आश्रम  सभी प्रकार के अन्धविस्वासों और कमजोर करने वाले विकारों को दूर रखेगा, साथ ही यहाँ एकता के सिद्दांत का मनन किया जायेगा. सभी प्रणालियों के साथ पूरी सहानभूति रखते हुवे यह आश्रम सिर्फ अद्वैत के लिए समर्पित है”.

अद्वैत आश्रम मायावती से प्रकाशित साहित्य
LITERATURE PUBLISHED  FROM ADVAITA ASHRAMA MAYAWATI

अद्वैत आश्रम मायावती से अंग्रेजी मासिक पत्रिका प्रबुद्ध भारत के अलावा अनेक महत्वपूर्ण साहित्य का जैसे कि भक्ति योग, ज्ञान योग, राज योग, स्वामी विवेकानंद के पत्र आदि प्रकाशन किया गया.

कैसे पहुचे अद्वैत आश्रम मायावती
HOW TO REACH ADVAITA ASHRAMA MAYAWATI

अद्वैत आश्रम मायावती पहुचने के लिए आपको उत्तराखंड के चम्पावत जिले में स्थित लोहाघाट शहर पहुचना पड़ेगा.

दिल्ली  से अद्वैत आश्रम मायावती
DELHI TO ADVAITA ASHRAMA MAYAWATI

दिल्ली से अद्वैत आश्रम मायावती पहुचने के लिए आप रेल मार्ग से काठगोदाम तक आ सकते है. काठगोदाम से रोड मार्ग के जरिये उत्तराखंड परिवहन की बस या निजी वाहन से टनकपुर, चम्पावत होते हुवे आप लोहाघाट पहुचेंगे. लोहाघाट से 9 किमी दूर मायावती आश्रम स्थित है.

रोड मार्ग से अद्वैत आश्रम मायावती
ADVAITA ASHRAMA MAYAWATI BY ROAD

आप दिल्ली, देहरादून या किसी भी शहर से हल्द्वानी या फिर टनकपुर, चम्पावत, लोहाघाट रोड मार्ग से भी पहुच सकते है. देल्ही से लोहाघाट सीधे रोड मार्ग से दूरी लगभग 430 किलोमीटर है. अगर आप काठगोदाम आते है तो आप एक अन्य मार्ग काठगोदाम से देवीधुरा होते हुवे भी लोहाघाट पहुच सकते है.

हवाई मार्ग से अद्वैत आश्रम मायावती.
ADVAITA ASHRAMA MAYAWATI BY AIR

अगर आप हवाई मार्ग से यात्रा करना चाहते है तो पंतनगर एअरपोर्ट सबसे नजदीकी एअरपोर्ट है. दिल्ली और देहरादून आदि बड़े शहरों से हवाई सेवा उपलब्ध रहती है. पंतनगर से लोहाघाट के बीच की दूरी लगभग 180 किलोमीटर है.

चम्पावत स्थिति अन्य मत्वपूर्ण पर्यटक स्थल
OTHER TOURIST PLACES AT CHAMPAWAT 

पर्यटक स्थलों के लिहाज से चम्पावत पूरे उत्तराखंड में एक मत्वपूर्ण स्थान है. पैराणिक महत्व के पर्यटक स्थल हो या एतिहासिक, चम्पावत दोनों ही मामलों में से एक बेहतरीन जगह है. जब आप मायावती आश्रम धूमने की योजना बना रहे हों तो आस- पास के पर्यटन स्थल और मंदिर घूमना न भूले.

ADVAITA ASHRAMA MAYAWATI
Advaita Ashrama Mayawati To Abott Mount

अद्वैत आश्रम मायावती जाने के बाद आप लोहाघाट से कुछ ही दूरी पर स्थित एबट माउंट घूमना न भूलें, साथ ही चम्पावत स्थित एतिहासिक बालेश्वर मंदिर भी आप जा सकते हैं

लोहाघाट से लगभग 40 किलोमीटर दूर देवीधुरा स्थित माँ बाराही देवी मंदिर जाना न भूले, यही से आगे लगभग 15 किलोमीटर दूरी पर स्थित रीठा साहिब गुरूद्वारे जाना भी काफी रोमांचक होगा.

आप वापस आते हुवे टनकपुर से लगभग 20 किमी दूरी पर स्थित माँ पूर्णागिरी मंदिर Purnagiri Mandir के दर्शन करने भी जा सकते है. साथ ही इसी रस्ते में आगे बड़ते हुवे आप नानकमत्ता साहिब के दर्शन भी कर सकते है.

          (Advaita Ashrama Mayawati मायावती आश्रम) By HindiWall

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नीम करोली बाबा | महान शिक्षाएं एवं जीवन परिचय | NEEM KAROLI BABA

Neem Karoli Baba | नीम करोली बाबा एक महान हनुमान भक्त संत थे. बहुत से लोग उन्हें  हनुमान जी का अवतार भी मानते है, प्यार से लोग उन्हें महाराज जी के नाम से भी भी पुकारते हैं. हनुमान जी के परम भक्त नीम करोली बाबा जी के दरबार कैंची धाम आश्रम एवं वृंदावन आश्रम में  हमेशा भक्तों का ताँता लगा रहता है. लोगों का कहना है कि दरबार में आकर उनकी मनोकामना पूरी होती है और महाराज कभी भी किसी भक्त को निराश नहीं छोड़ते.

भारत  की धरती पुरातन काल से महान संतो, महापुरुषों एवं विदुषियों की जन्मदायिनी रही है. संत चाहे दुनिया के किसी भी कोने में पैदा हुवा हो, सही मायनो में संत वही है जो इंसानो को सही एवं कुदरती राह पर चलना सिखाता है. भारतीय संत परम्परा में संत कबीर से लेकर गुरनानक देव, बुल्ले शाह, मलूकदास, ज्योतिबा फुले, स्वामी विवेकानंद Swami Vivekananda आदि सभी संतों की सामान्य प्रवृति में ज्ञान एवं कर्म की साधना करना एवं इसका उपयोग मानव एवं कुदरत सहअस्तिव के लिए करने का भाव है. परन्तु ज्ञान, कर्म एवं भक्ति की साधना कर महान मानवीय या फिर ईश्वरीय गुणों को प्राप्त करने और उनको मानवता की सेवा में समर्पण कर देने का एक बड़ा उदहारण “नीम करोली बाबा” है.
  • नीम करोली बाबा प्रारंभिक जीवन (EARLY LIFE OF NEEM KAROLI BABA)

हनुमान के भक्त महाराज नीम करोली बाबा जी का जन्म सन 1900 के आस पास उत्तर- प्रदेश के फिरोजाबाद जिले के अकबरपुर नमक ग्राम में एक ब्राह्मण परिवार में हुवा था. नीम करोली महाराज के पिता का नाम श्री दुर्गा प्रशाद शर्मा था. नीम करोली बाबा जी के बचपन का नाम लक्ष्मी नारायण शर्मा था.  अकबरपुर के किरहीनं गांव में ही उनकी प्रारंभिक शिक्षा- दीक्षा हुवी. मात्र 11 वर्ष कि उम्र में ही लक्ष्मी नारायण शर्मा का विवाह हो गया था. परन्तु  जल्दी ही उन्होंने घर छोड़ दिया और लगभग 10 वर्ष तक घर से दूर रहे.

Order  Handmade Painting  of Neem Karoli Baba at Picpainter

 एक दिन उनके पिता को किसी ने उनकी खबर दी, पिता उनसे मिले और गृहस्थ जीवन का पालन करने का आदेश दिया. पिता के आदेश को तुरंत मानते हुवे वो (Neem Karoli Baba )घर वापस लौट  आये और पुनः गृहस्थ जीवन आरम्भ कर दिया. गृहस्थ  जीवन  के साथ- साथ सामाजिक और धार्मिक कार्यों में वो बढ़ – चढ़ हिस्सा लिया करते थे.बाद में ही दो बेटों एवं एक बेटी के पिता भी बन गए, परन्तु घर गृहस्थी में लम्बे समय तक उनका मन नहीं रमा और कुछ समय बाद लगभग 1958 के आस- पास उन्होंने फिर से गृह त्याग कर दिया

  • गृह त्याग एवं तपस्या (LEAVING THE HOME AND AUSTERITY)

घर-बार त्याग कर वो (Neem Karoli Baba)अलग- अलग जगह घूमने लगे. इसी भृमण के दौरान उनको हांड़ी वाला बाबा, लक्ष्मण दास, तिकोनिया वाला बाबा आदि नामों से जाना जाना गया. कहा जाता है कि और उन्होंने मात्र 17  वर्ष की आयु में ज्ञान प्राप्त कर लिया था. नीम करोली बाबा जी ने गुजरात के बवानिया मोरबी में साधना की और वहां वो तलैयां वाला बाबा के नाम से विख्यात हो गए. वृंदावन में महाराज जी, चमत्कारी बाबा के नाम से जाने गए.

  • नीम करोली बाबा बनने की कहानी (STORY OF  NEEM KAROLI BABA)

 कहते है कि गृह- त्याग के बाद, जब वो अनेक स्थानों के भृमण पर थे  तभी एक बार महाराज जी एक स्टेशन से ट्रेन किसी वजह से बिना टिकट के ही चढ़ गए और प्रथम श्रेणी में जाकर बैठ  गए. मगर कुछ ही समय बाद टिकट चेक करने के लिए एक कर्मचारी उनके पास आया और टिकट के लिए बोला, महाराज ने बोला टिकट तो नहीं है, कुछ वाद- विवाद के बाद ट्रेन के ड्राइवर एक जगह जिसका ट्रेन रोक दी. महाराज को उतार दिया गया और ट्रेन ड्राइवर वापस ट्रेन चलने लगा. मगर ट्रेन दुबारा स्टार्ट नहीं हुवी. बहुत कोसिस की गयी, इंजिन को बदल कर देखा गया मगर सफलता हाथ नहीं लगी.

इसी बीच एक अधिकारी वहां पहुंचे और  उन्होंने ट्रेन को अनियत स्थान पर रोके जाने का कारण जानना चाहा. तो कर्मचारियों ने पास में ही में एक पेड़ के नीचे बैठे हुवे साधु (Neem Karoli Baba ) को इंगित करते हुवे, कारण अधिकारी को बता दिया. वो अधिकारी महाराज और उनकी दिव्यता से परिचित था. अतः उसने साधु को वापस ट्रेन में बिठाकर ट्रेन स्टार्ट करने को कहा. साधु ने इंकार कर दिया परन्तु जब अन्य सहयात्रियों ने भी महाराज से बैठ जाने का आग्रह किया तो महाराज ने दो शर्ते रखी. एक कि उस स्थान पर ट्रेन स्टेशन बनाया जायेगा, दूसरा कि साधु सन्यासियों के साथ भविष्य में ऐसा वर्ताव नहीं किया जायेगा. रेलवे के अधिकारिओं ने दोनो शर्तों के लिए हामी भर दी तो महाराज ट्रेन में चढ़ गए और ट्रेन चल पड़ी.

बाद में रेलवे ने उस गांव में एक स्टेशन बनाया. कुछ समय बाद महाराज उस गांव में आये और वहां  रुके तभी से लोग उन्हें नीब करोरी वाले बाबा (Neeb Karori Baba) या नीम करोली बाबा (Neem Karoli Baba)के नाम से जानने लगे

  • नीम करोली बाबा की महासमाधि (NIRVANA OF NEEM KAROLI BABA)

Neem Karoli Baba | नीम करोली बाबा जी आगरा से वापस कैंची धाम आ रहे थे. जहां वो ह्रदय में दर्द की शिकायत के बाद जरुरी चिकित्सा जाँच के लिए गए थे, इसी बीच मथुरा स्टेशन पर पुनः दर्द  होने के कारण उन्होंने अपने शिष्यों को वृंदावन आश्रम वापस चलने के लिए कहा. तबियत ज्यादा ख़राब होने कि वजह से शिष्यों ने उन्हें वृंदावन में एक हॉस्पिटल के आकस्मिक  चिकिस्ता सेवा कक्ष  में भर्ती कर दिया. डॉक्टर्स ने उन्हें कुछ इंजेक्शन दिए और आक्सीजन मास्क लगा दिया.

कुछ ही देर में महाराज वापस बैठ गए और आक्सीजन मास्क को उतार कर कहा “बेकार” कि (अब ये सब बेकार है) और महाराज (Neem Karoli Baba) धीरे- धीरे  कई बार “जय जगदीश हरे” पुकारते हुवे 11 सितम्बर 1973 को 1 बजकर 15 मिनट के समय बहुत ही शांति के साथ में लीन  हो गए .

कैंची धाम आश्रम (KAINCHI DHAM ASHRAM)

अपने जीवन- काल में नीम करौली बाबा जी (Neem Karoli Baba) ने अनेकों स्थानों का भ्रमण किया. महाराज ने 100 से भी अधिक मंदिरों और आश्रमों का निर्माण करवाया था, जिसमे से वृंदावन और कैंची धाम आश्रम मुख्य है. कैंची धाम आश्रम में नीम करौली बाबा जी अपने जीवन के अंतिम दशक में सबसे ज्यादा रहे, इस आश्रम का निर्माण 1964  में करवाया गया था. आरम्भ में यह स्थान दो स्थानीय साधुओं, प्रेमी बाबा और सोमवारी महाराज के लिए यज्ञ हेतु बनवाया गया था,  साथ ही यहाँ एक हनुमान मंदिर कि स्थापना भी उसी समय पर की गई.  कैंची धाम उत्तराखंड के नैनीताल  से लगभग १७ किलोमीटर दूर अल्मोड़ा – नैनीताल रोड पर स्थित है. यह स्थान अत्यंत खूबसूरत एवं पहाड़ियों से घिरा हुवा है.

आश्रम की स्थापना की वर्षगांठ के अवसर पर हर  वर्ष 15 जून  को यहां पर मेले का आयोजन होता है, जिसमे देश  विदेश से लाखो लोग हिस्सा लेते है.

नीम करोली बाबा जी के अनुयायों का फैलाव सिर्फ भारतवर्ष में ही नहीं वरन यूरोप से लेकर अमेरिका तक है. बाबा रामदास, भगवान् दास , माँ जया, जय उत्त्कल, कृष्णा दास उनके मुख्य शिष्य है. इसके अलावा फेसबुक के संस्थापक मार्क जुकरबर्ग, स्टीव जॉब्स आदि जैसी बड़ी नामचीन हस्तियां भी बाबा जी के मंदिर आते रहे है.


कैसे पहुंचे कैंची धाम (HOW TO REACH KAINCHI DHAM )

Neem Karoli Baba Ashrama |  देश के किसी भी हिस्से से आप को नैनीताल के हल्द्वानी शहर या काठगोदाम पहुंचना होगा. काठगोदाम पहुंचने के लिए भारतीय रेल की सेवा का उपयोग किया जा सकता है जो काठगोदाम तक उपलब्ध है. या फिर सड़क मार्ग से भी आप हल्द्वानी, काठगोदाम होते हुवे कैंची धाम जा सकते है.

अगर आप हवाई मार्ग से आते है तो पंतनगर एयरपोर्ट तक का सफर आप हवाई मार्ग से कर  सकते है. पंत नगर एयरपोर्ट से कैंची धाम की दूरी लगभग 72 किलोमीटर है. इस सफर को  आप निजी वाहन या उत्तराखंड परिवहन की बस से भी तय कर सकते है.

काठगोदाम के बाद लगभग 40  किलोमीटर पहाड़ी सफर सड़क मार्ग से तय करना होता है. निजी वाहन या उत्तराखंड परिवहन की बसों से भी ये सफर तय किया जा सकता है.

कैंची धाम यात्रा के साथ ही आस-पास के अन्य दर्शनीय स्थल जैसे की अल्मोड़ा स्थित जागेश्वर धाम, गोलू-चितई मंदिर, चम्पावत के पूर्णागिरि मंदिर (Purnagiri Mandir), नानकमत्ता साहिब, रीठा साहिब आदि धार्मिक स्थानों के अलावा नैनीताल, रानीखेत जैसे खूबसूरत पर्यटक स्थलों की यात्रा का भी आनंद उठा सकते हैं.

           

नीम करोली बाबा जी के पवित्र वचन और शिक्षायें (DIVINE QUOTES AND EDUCATION OF NEEM KAROLI BABA JI)

  • “ईश्वर के प्रेम को छोड़कर, सब कुछ अस्थायी है”

Everything is impermanent, except love of God. (Neem Karoli Baba)

  • “यदि आप ईश्वर देखना चाहते हैं, मन की इच्छाओं को मार डालो, यदि कोई इच्छा है तो उस पर कार्रवाई न करें और वह दूर जाएंगे। यदि आप  चाय पीने की इच्छा रखते हैं, न पिए और  इच्छा दूर हो जाएगी”

If you want to see God, Kill desires. Desires are in the mind. When you have a desire for something, do not act on it and it will go away. If you desire to have a cup of tea, do not do and the desire for the tea will surely go away. (Neem Karoli Baba)

  • ” इंसान अक्सर किसी और काम के लिए जाता है और दूसरा पाता है”

Often one goes for one thing and finds another. (Neem Karoli Baba)

  • “सम्पूर्ण सत्य आवश्यक है, आप जो कहते हैं उसके अनुसार जीवित रहना चाहिए”

Complete truth is necessary. You must breathe by what you speak . (Neem Karoli Baba)

  • “हर किसी से प्रेम करो, हर किसी की सेवा करो, भगवान को स्मरण करें, और सत्य को बताएं”

Love everyone, serve everyone, never forget the God and tell the truth always.

  • “कुछ भी गुरु हो सकता है – वह एक पागल या आम व्यक्ति हो सकता है एक बार जब आप उसे स्वीकार कर लेते हैं, तो वह प्रभुओं का स्वामी है”

Whatever may be guru. It may be a outrageous or a common person. Once you have accepted him, he is the lord of lords. (Neem Karoli Baba)

  • “सभी धर्म समान हैं, सभी एक ही परमात्मा  की तरफ जाते है. भगवन सर्वत्र व्याप्त  है”

All religions are the same. They all lead to God. God is everywhere. (Neem Karoli Baba)

  • “पूरे ब्रह्माण्ड हमारा घर  है और इसमें रहने वाले सभी लोग हमारे परिवार के हैं. किसी विशेष रूप में भगवान को देखने की कोशिश करने के बजाय, उसे हर चीज में देखना अच्छा है”

The whole universe is our home and all residing in it belong to our family. Instead of trying to see God in a particular appearance, see it in everything. (Neem Karoli Baba)

  • “वासना, लालच, क्रोध, अनुलग्नक – ये नरक के सभी रास्ते हैं”

Lust, greed, anger, attachment – These are all paths to hell. (Neem Karoli Baba)

  • “भगवान  को  ध्यान  में  रखना  ही वास्तव  में  सबसे  बड़ी  सेवा  है. हर  समय  आपके  मस्तिष्क  में  भगवन की छवि होनी  चाहिए”

The best service is, keep the thoughts of God. Keep the God in mind every minute. (Neem Karoli Baba)

  •  “यदि आप एक दूसरे से प्यार नहीं कर सकते, तो आप अपना लक्ष्य प्राप्त नहीं कर सकते”

If you do not love each other, you cannot achieve your goal. (Neem Karoli Baba)

  • “यह दुनिया एक छलावा है, फिर भी आप चिंतित हैं क्योंकि आप संलग्न हैं”

This world is the illusion. Yet you get worried because you are attached. (Neem Karoli Baba)

  • “जब आप उदास होते हैं, दर्द में या बीमार  होते हैं या आप किसी भी अंतिम संस्कार में गए होते  हैं, तो आप वास्तव में जीवन की कई सच्चाई सीखते हैं”

When you are sad or in pain, sick, or you witness any cremation then you actually learn the many truth of life.  (Neem Karoli Baba)

  • “भगवान को देखने के लिए सबसे अच्छा तरीका .. उसे  हर रूप में देखना है”

The best from to see God in…is in every form. (Neem Karoli Baba)

  • “सभी सांसारिक चीजों से  मन को  साफ़ करें. यदि आप अपने दिमाग को नियंत्रित नहीं कर सकते, तो आप भगवान को कैसे महसूस करेंगे”

Clear the mind of all worldly things. If you cannot control your mind, how will you realize God. (Neem Karoli Baba)

By HindiWall

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पूर्णागिरी मंदिर (Purnagiri Mandir)

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पूर्णागिरि मंदिर | HISTORY OF PURNAGIRI TEMPLE (PURNAGIRI MANDIR)

Purnagiri Mandir | माता पूर्णागिरि मंदिर  उत्तराखंड  के  चम्पावत जिले में टनकपुर नामक सीमान्त कस्बेसे  लगभग 20 किलोमीटर उत्तर की तरफ, समुद्र तल से ३००० मीटर की ऊचाई पर स्थितअन्नपूर्णा नामक शिखरपरस्थित है.

 108 सिद्द पीठों में से एक पूर्णागिरि मंदिर (Purnagiri Mandir ) का एक महान पैराणिक इतिहास है.  मान्यता है कि दक्षप्रजापति की कन्या तथा भगवान शिव की पत्नी सती की नाभि भगवान विष्णु के चक्र से कटकर इसी स्थान पर गिरीथी.  इसीलिए हर साल लाखो भक्त देश विदेश से तरह- तरह की मनोकामना लेकर यहां आते है.

माँ पूर्णागिरि मंदिर का इतिहास

History of Purnagiri Temple (Purnagiri Mandir)

शिव पुराण में रुद्र-सहिंता के अनुसार, राजा दश प्रजापति की कन्या सती का विवाह भगवान शिव के साथ हुवा था. कहा जाता है कि ब्रम्हा पुत्र दश प्रजापति  ने एक बार एक विशाल यज्ञ किया था था. जिसके लिए उन्होंने सभी देवी- देवताओं और ऋषिओं को निमंत्रित किया था. परन्तु भगवान शिव को किसी पूर्वाग्रह की वजह से अपमानित करने की दृष्टि से निमंत्रण नहीं दिया. जिसे पार्वती (सती) ने भगवान शिव का घोर अपमान समझा और यज्ञ की वेदी में अपनी देह की आहुति कर दी.

भगवान शिव यह जानकर बहुत ही क्रोधित हो गए. और अपनी पत्नी के जली हुवी देह को लेकर आसमान में विचरण करते हुवे तांडव करने लगे. भगवान शिव का तांडव देखकर सारे देवी देवता परेशान हो गए और भगवान विष्णु से प्रार्थना करने लगे. भगवान विष्णु ने चिंतित होकर अपने चक्र से  भगवान शिव द्वारा हाथ में लिए गए माता  सती की देह के अलग- अलग हिस्से  कर दिए. अलग अलग हिस्से अलग- अलग जगहों में गिरे. और जहां-जहां भी गिरे वहां- वहां शक्तिपीठों की स्थापना हुवी.

इन्ही हिस्सों में से एक हिस्सा जो कि माता सती की नाभि का था, अन्नपूर्णा पर्वत शिखर में जा कर गिर गया. कालान्तर में यह स्थान पूर्णागिरि कहलाया. (Purnagiri Mandir) माता पूर्णागिरि मंदिर में देवी के नाभि की पूजा की जाती है.

पूर्णागिरि मंदिर कैसे पहुंचे

How to Reach Purnagiri Temple (Purnagiri Mandir)

देश की राजधानी दिल्ली से लगभग 342 किलोमीटर दूर उत्तराखंड का टनकपुर  शहर माँ पूर्णागिरि मंदिर जाने के लिए आखिरी पड़ाव है. दिल्ली से टनकपुर पहुंचने के लिए ज्यादातर लोग सड़क मार्ग का प्रयोग करते है. टनकपुर पहुंचने के के लिए सबसे बेहतरीन साधन उत्तराखंड रोडवेज की बसें है. जो की आनंद विहार काउंटर नंबर 160 पर लगभग पूरे  दिन उपलब्ध रहती है. इसके अलावा  भारतीय रेल के द्वारा टनकपुर स्टेशन पर पहुंचा जा सकता है. भारतीय रेल की दिल्ली से कोई सीधी सेवा तो नहीं है मगर रुद्रपुर तक या फिर हल्द्वानी या काठगोदाम तक भारतीय रेल से यात्रा संपन्न की जा सकती है.  काठगोदाम से टनकपुर की यात्रा निजी वाहन से  या फिर उत्तराखंड रोडवेज की बस से पूरा किया जा सकता है.

लखनऊ से पूर्णागिरि की यात्रा

Journey From Lucknow To Purnagiri Temple (Purnagiri Mandir)

लखनऊ से पूर्णागिरि पहुंचने के लिए भी  पहले टनकपुर पहुंचना पड़ेगा. और टनकपुर पहुंचने के सबसे उपयुक्त साधन भारतीय रेल है जो सप्ताह के सातों दिन उपलब्ध है. हालाँकि उत्तर-प्रदेश और उत्तराखंड रोडवेज की बसे भी इस यात्रा के लिए उपलब्ध है.

हवाई मार्ग

By Air

आप देश भर की अलग- अलग जगहों से उत्तराखंड के उधमसिंघ नगर स्थित पंतनगर एयरपोर्ट पहुंचकर, निजी या फिर उत्तराखंड रोडवेज की बसों से टनकपुर (Purnagiri Mandir)  तक पहुंच सकते है.

टनकपुर से पूर्णागिरि मंदिर

Tankpur To Purnagiri Temple (Purnagiri Mandir)

टनकपुर शहर जो की उत्तराखंड के चम्पावत जिले का हिस्सा है. (Purnagiri Mandir)  माँ पूर्णागिरि के भक्तों का मुख्य पड़ाव होता है.  बेहद खूबसूरत वनाचाद्दित पहाड़ियों की गोद में बसा छोटा सा शहर टनकपुर माँ पूर्णागिरि के आशीर्वाद की तरह प्रतीत होता है. टनकपुर पहुंचने के बाद पूर्णागिरि पहुंचने के लिए  टनकपुर से  आगे 17  किलोमीटर की दूरी अलग- अलग तरह के निजी वाहनों या फिर उत्तराखंड परिवहन की बस से तय की जा सकती है. जबकि अंतिम 3 किमी की यात्रा पैदल करनी पड़ती है, जिसमे खड़ी पहाड़ी के ऊपर चढ़ना पड़ता है. और इस तरह हम पहुंचते है माँ पूर्णा के दरबार पूर्णागिरि मंदिर.

माँ पूर्णागिरि मेला

Fair and Festival at Purnagiri Temple (Purnagiri Mandir)

माँ पूर्णागिरि मंदिर में लगभग वर्ष के 12  महीने भीड़ रहती है. मगर चैत्र की नवरात्रियों में यहाँ एक बड़े मेले का आयोजन होता है जो जून आखिरी तक चलता रहता है. मेले की प्रशासनिक  जिम्मेदारी चम्पावत जिला पंचायत की होती है. प्रशासन श्रद्धालुुओं  की हर तरह से सुविधा हेतु मौजूद रहता है. लगभग तीन माह तक चलने वाले इस मेले में हर साल लगभग 25 से 30 लाख श्रद्धालु  देश विदेश से  दर्शन के लिए माँ पूर्णागिरि के दरबार में पहुंचते है. टनकपुर शहर में (Purnagiri Mandir) मेले के समय बहुत भीड़ भाड़ रहती है.

मान्यताये एवं किवदंतियां

Belief and Stores of Purnagiri Temple (Purnagiri Mandir)

लोग छोटे बच्चों का मुंडन संस्कार के लिए माँ पूर्णागिरि मंदिर आते है. माँ पूर्णागिरि मंदिर के सम्बन्ध में मान्यता है कि, जो भी श्रद्धालू यहां पूर्ण निष्ठा एवं विश्वास के साथ आता है उसकी मनोकामना अवश्य पूरी होती है. लोग मंदिर के रस्ते में उगी घास पर गाँठ बांधकर मनौती मांगते है और जब मनोकामना पूरी होती है तो दुबारा आकर गाँठ को खोलते है. कुछ लोग चुनरी लेकर भी गाँठ बांधते और खोलते है.

(Purnagiri Mandir)  माँ पूर्णागिरि के दरबार के थोड़ा ही ऊपर एक चोटी और है, जिस पर चढ़ना शुभ नहीं माना जाता. वहां मौजूद पुजारी लोग इस बात के लिए मना करते है. कहा जाता है एक बार एक साधु नहीं माना और इस टिकरी पर चढ़ाई करने लगा.  माँ पूर्णागिरि ने उसे नीचे शारदा में फैक दिया. चूँकि वह श्रदालु माता का अनन्य भक्त था.  इसलिए माता ने उसे आशीर्वाद दिया कि तू आज से सिद्द बाबा के नाम से जाना जायेगा और जो भी मेरे दर्शन के लिए आएगा वो तेरे भी दर्शन करेगा. तब से अब तक जो भी माँ पूर्णागिरि मंदिर दर्शन के लिए जाता है उसे  सिद्ध बाबा के दर्शन हेतु जाना पड़ता है.

झूठे मंदिर कि कहानी

Story of Jhutha Mandir at Purnagiri Temple (Purnagiri Mandir)

किवदंती है कि एक बार एक सेठ व्यक्ति ने माँ के दरबार (Purnagiri Mandir)  में आकर पुत्र प्राप्ति हेतु वर माँगा, और कहा कि वचन दिया की पुत्र प्राप्ति के बाद वह सोने का मंदिर चढ़ाएगा. पुत्र प्राप्ति के बाद लोभवश उसने तांबे का मंदिर बनाकर उसको सोने की पालिश चढ़ा दी और चढ़ावे के लिए ले आया. मगर दुन्यास नामक स्थान पर आने के बाद वो उस मंदिर को आगे न ला सका. इस तरह इस तांबे के मंदिर का नाम झूठा मंदिर पड़ गया.

पूर्णागिरि मंदिर में पूजा अर्चना हेतु सामग्री

Essential Items for Veneration At Purnagiri Temple (Purnagiri Mandir)

माँ  पूर्णागिरि मंदिर में चढ़ावे का रिवाज भी कमोबेश अन्य मंदिरों कि तरह ही है. मगर इस मंदिर में चढ़ावे के लिए, नारियल एवं चुनरी का विशेष महत्व है. चढ़ावे हेतु लोग अपनी मनोकामना के हिसाब से सामग्री लाते है. स्त्रियां श्रृंगार का सामान चढ़ावे के रूप में लेकर आती है. सामान्य तौर पर नारियल, चुनरी, प्रसाद, धूप, अगरबत्ती आदि चढ़ावे के लिए दिया जाता है. मंदिर के आस-पास बहुत सी छोटी-बड़ी दुकाने, प्रसाद एवं अन्य जरुरी वस्तुए बेचते हुवे मिल आपको जायेंगे. इसलिए प्रसाद के लिए किसी श्रदालु को ज्यादा परेशान होने की जरुरत नहीं है.

 ध्यान रखने योग्य बातें.

Things To Note at Purnagiri Temple (Purnagiri Mandir)

पूजा अर्चना कि सामग्री लेकर मंदिर परिसर में पहुंचने के बाद वहां मौजूद पुजारियों के माध्यम से पूजा अर्चना सम्पन की जाती है. मेले के समय में भीड़ ज्यादा होने  के कारण और मुख्य मंदिर परिसर कि जगह बहुत सकरी और कम होने के कारण पूजा अर्चना के लिए समय ज्यादा नहीं मिल पाता. अतः कोई विशेष पूजा या पाठ करने का मन बना रहे हों तो नवरात्रि के बाद या आगे- पीछे कभी भी जा सकते है

पूर्णागिरि मंदिर के आस-पास ठहरने के लिए होटल

Hotels Near Purnagiri Temple (Purnagiri Mandir)

(Purnagiri Mandir) पूर्णागिरि मंदिर के दर्शनाभिलाषी भक्तों के ठहरने के लिए टनकपुर में अनेक होटल और एक धर्मशाला है. मेले के समय से होटलों में काफी भीड़ रहती है. उचित किराये के साथ अच्छी सुविधाओं के लिए  पंचमुखी धर्मशाला है जो कि टनकपुर में शारदा के किनारे स्थित है

पूर्णागिरि मंदिर में दर्शन करते हुवे आस- पास के अन्य दर्शनीय स्थल

Other Tourist Places Near Purnagiri Temple (Purnagiri Mandir)

माँ  पूर्णागिरि के दर्शन करते हुवे  आस- पास अन्य दर्शनीय स्थान- टनकपुर शहर अपने आप में एक दर्शनीय शहर है. इसके अलावा सिद्द बाबा का मंदिर भी आस- पास ही स्थित है. अगर आप दो तीन दिन और लगा सकते है तो टनकपुर से 75 किलोमीटर दूर स्थित चम्पावत शहर, चम्पावत स्थित बालेश्वर मंदिर, लोहाघाट के मायावती स्थित स्वामी विवेकानंद द्वारा स्थापित अद्वैत आश्रम आदि बहुत ही सुन्दर और ऐतिहासिक स्थान है.

चम्पावत के सिक्खों का पवित्र  धार्मिक स्थल गुरुद्वारा श्री  रीठा साहिब भी है जो कि चम्पावत लगभग 70 अल्मोड़ा जाने वाले रस्ते में पड़ता. इसके अलावा एक सिक्खों का ही एक बेहद ही प्रसिद्द धार्मिक स्थल श्री नानकमत्ता साहिब भी टनकपुर से लगभग 40 किलोमीटर की दूरी में हल्द्वानी वाली रोड में स्थित है

 Purnagiri Mandir By HinDiwall

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स्वामी विवेकानंद के विचार (Thougths of Swami Vivekananda)

स्वामी विवेकानंद का जीवन(Swami vivekananda Life History)

स्वामी विवेकानंद की प्रेरणादायक जीवनी (Swami Vivekananda Biography in Hindi)

Swami vivekananda biography in hindi.  उत्तिष्ठत जाग्रत प्राप्य वरान्निबोधत”अर्थात “उठो, जागो और लक्ष्य की प्राप्ति तक रुको मत”.  इस तरह के महान विचारों के प्रचारकस्वामी विवेकानंद हमारे देश की महान विभूतियों में से एक हैं. स्वामी विवेकानंद ने पूरे भारतीयउपमहाद्वीप एवं संसार में घूम– घूम कर, मानवता की सेवा एवं विश्व के कल्याण के लिए कार्यकिया. भारतीय दर्शन को पुरे संसार में पहचान दिलाने में स्वामी जी की महत्वपूर्ण भूमिका रही हे. स्वामी विवेकानंद ने धर्म की आड़ में की जा रही कुप्रथाओ के खिलाप बोला. समाज में फैले तरह – तरह की कुरीतियों को ख़तम करने एवं समाज को नए रस्ते पर ले जाने का कार्य बड़ी ही कुशलता–पूर्वक किया.

स्वामी जी परगतिशीलता को अपनाने पर बल देते थे और भारतीय दर्शन एवं संस्कृति को प्रगतिशीलबिचारों का वाहक मानते थे. योग एवं ध्यान के एक अलग प्रारूप को दुनिया के सामने लाकर, स्वामीविवेकानंद ने मानव जीवन को एक नयी राह दिखाई. स्वामी विवेकानंद आध्यात्मिक उत्थान,  आत्मिक सुधार, कर्मयोग एवं  ज्ञानयोग के महानतम सिद्धांतों के प्रतिपादक भी थे.  उन्होंने 1893 में अमेरिका के शिकागो में हिंदू दर्शन के ऊपर व्याख्यान दिया जो उस समय बहुत सराहा गया. स्वामी विवेकानंद को भारतीय दर्शन, योग एवं वेदों  के  सार को पश्चिमी सभ्यता तक  पहुंचाने  में दिए गए योगदान  के लिए हमेशा याद किया जाता है. हिंदू धर्म को विश्व में पहचान दिलाने मेंस्वामी विवेकानंद की महत्वपूर्ण भूमिका है. उन्होंने बिखरे हुए भारतीय समाज में राष्ट्रीयता कीभावना को जागृत कर भारत के एकीकरण के लिए भी बहुत से प्रयास किए.

भारत के स्वाधीनता आंदोलन के बिचारकों एवं स्वाधीनता आंदोलन के प्रारूप पर गौर करने परस्वामी विवेकानंद की छाप स्पस्ट देखि जा सकती है. एक कुलीन परिवार में पैदा होने के बाद भी आध्यात्म की तरफ उनका झुकाव चौका देने वाला था.  भारतीय संत परंपरा के महानतम संत थे. गुरु रामकृष्ण परमहंस के प्रभाव में आने के बाद स्वामी विवेकानंद मानवता की सेवा को ही अपनाधर्म समझने लगे थे.  हिंदू धर्म के पुनरुत्थान के लिए किए गए कार्यों  के कारण ही स्वामी विवेकानंदजी का स्थान हिंदू धर्म में  पूज्यनीय है. भारतीय परंपरा में उन्हें ए0क राष्ट्रभक्त संत के रूप में जानाजाता है एवं  युवाओं के बीच में  स्वामी विवेकानंद एक आदर्श की तरह हमेशा जिंदा है.

“स्वामी विवेकानंद का जन्म दिवस अर्थात  12 जनवरी भारत में युवा दिवस के रुप में मनाया जाताहै”.

स्वामी विवेकानंद (नरेन्द्रनाथ दत्त) का प्रारंभिक जीवन

Initial Life of Swami Vivekananda (Narendranath Datt)

स्वामी विवेकानंद का जन्म 12 जनवरी 1863 को कोलकाता , जो कि उस समय ब्रिटिश साम्राज्य कीराजधानी था के एक संपन्न कायस्थ, बंगाली परिवार में हुआ था. उनके बचपन का नाम  नरेंद्रनाथदत्त था. उनके पिता श्री विश्वनाथ कोलकाता हाईकोर्ट मैं अटॉर्नी  थे, तथा नरेन्द्रनाथ दत्त के दादाश्री दुर्गाचरण दत्त संस्कृत और फारसी के महान विद्वान थे.  श्री दुर्गा चरण दत्त ने 25 वर्ष कीअवस्था में अपने परिवार का त्याग कर सन्यास ग्रहण कर लिया था, नरेन्द्रनाथ दत्त  जी की माता श्रीमती भुवनेश्वरी देवी एक धार्मिक किस्म की घरेलू महिला  थी.

पिता के प्रगतिशील विचार एवं माता  के धार्मिक स्वभाव का बालक नरेंद्र नाथ दत्त पर गहरा प्रभावपड़ा, नरेंद्र नाथ बचपन से ही आध्यात्म के रास्ते पर चल पड़े थे. बहुत ही कम उम्र से वह शिव, श्रीराम,  सीता  आदि की  मूर्तियों के सामने योग साधना एवं अभ्यास करने  लगे. हालांकि अपने बचपनमैं बालक नरेंद्रनाथ दत्त बहुत ही नटखट स्वभाव  के थे,  कई बार उनके माता–पिता को उन्हेंसमझाना–बुझाना मुश्किल हो  जाता था,  यहां तक  की उनकी माता जी श्रीमती भुवनेश्वरी देवी कहांकरती थी, मैंने भगवान से एक पुत्र की कामना की थी मगर भगवान ने मुझे  अपना एक राक्षस भेजदिया. (Swami Vivekananda Biography in Hindi)

स्वामी विवेकानंद का स्कूली शिक्षा जीवन.

(School Life and Education of Swami Vivekananda)

 सन 1871 में नरेन्द्रनाथ दत्त के  8 साल के थे  तब उनका दाखिला ईश्वर चंद्र विद्यासागरमेट्रोपोलिटन इंस्टीट्यूट में करवाया गया. वहां उन्होंने 1877 तक शिक्षा हासिल की, उसके बादउनका परिवार रायपुर आ गया 1879 में उनका परिवार  पुनः कोलकाता वापस आ गया.  प्रेसिडेंसीकॉलेज कोलकाता  की प्रवेश परीक्षा  को प्रथम श्रेणी से उत्तीर्ण करने के पश्चात नरेन्द्रनाथ दत्त  नेउच्च शिक्षा की शुरुआत की.

 नरेन्द्रनाथ दत्त एक मेधावी छात्र थे. साइकोलॉजी,  इतिहास, धर्म, समाज–विज्ञान,  कला, एवंसाहित्य जैसे विषयों पर उनकी मजबूत पकड़ थी. साथ ही भगवत गीता, वेद, उपनिषद, महाभारत, रामायण, पुराण आदि का अध्ययन भी नरेन्द्रनाथ दत्त ने बहुत ही रुचि के साथ किया. अपने कॉलेजके दिनों में नरेन्द्रनाथ दत्त खेलकूद, भारतीय शास्त्रीय संगीत  तथा पश्चिमी सभ्यता से संबंधितसिद्धांतों,   दर्शन, इतिहास मैं गहरी रुचि रखते थे. एवं इन सब से संबंधित आयोजनों में बढ़ चढ़करहिस्सा लिया करते थे.

कोलकाता स्थित जनरल असेंबली इंस्टिट्यूट  जो  की अब स्कॉटिश चर्च कॉलेज के नाम से जानाजाता है से नरेन्द्रनाथ दत्त ने पश्चिमी दर्शन इतिहास में  आगे की पढ़ाई की थी.  इसी कॉलेज मेंनरेन्द्रनाथ दत्त ने डेविड ह्यूम, जॉर्ज डब्ल्यू एफ हेगल, अगस्त काम्टे, जॉन स्टुअर्ट मिल, चार्ल्सडार्विन आदि के कार्यों के बारे में विशेष रुप से अध्ययन किया.   हर्बर्ट  स्पेंसर के काम से वह काफीप्रभावित हुए तथा उनकी किताब “एजुकेशन” का बंगाली में अनुवाद भी नरेन्द्रनाथ दत्त ने किया. यही नहीं संस्कृत और बंगाली भाषा  और साहित्य का भी उन्होंने गहन अध्ययन किया था. जनरलअसेंबली इंस्टिट्यूट के प्रिंसिपल विलियम हेस्टई  ने नरेंद्र नाथ दत्त के बारे में लिखा है, “नरेंद्रवास्तव में बुद्धिमान है,  मैं बहुत दूर–दूर तक घूम चुका हूं लेकिन इस तरह की योग्यता और प्रतिभामैंने कहीं नहीं देखी मैं जर्मन की यूनिवर्सिटी में  भी रहा और भी कई जगह”.

स्वामी विवेकानंद का शिक्षा के बाद का शुरुआती जीवन.

Life of Swami Vivekananda after Education

नरेंद्र नाथ दास सन 1880 में नव विधान जोकि केशवचंद्र सेन की एक संस्था थी  के साथ जुड़ गए,  नव विधान की स्थापना केशवचंद्र सेन ने रामकृष्ण से मिलने के बाद की थी, जब वह क्रिश्चियन धर्मसे पुनः वापस हिंदू धर्म में परिवर्तित हो रहे थे. नरेन्द्रनाथ दत्त ब्रह्मा समाज में भी लंबे समय तकसक्रिय रहे तथा  “सेन की बैंड ऑफ होप”  नामक संस्था के साथ भी उन्होंने काम किया   इस संस्था  के जरिये युवाओं को धूम्रपान और शराब से दूर रहने के लिए प्रेरित करते थे.

ब्रम्हा समाज और स्वामी विकेकानंद

Bramha Samaj and Swami Vivekananda

नरेन्द्रनाथ दत्त के जीवन में ब्रह्म समाज की अवधारणाओं का असर रहा.  जिसके कारण  मूर्ति पूजाऔर निराकार देवता तथा अन्य बहुत से आडंबरों   जो  कि  उस समय समाज में  प्रचलित थे काउन्होंने हमेशा विरोध किया. उनका जीवन आधुनिक तर्कसंगत, वैज्ञानिक अध्यात्मवाद औरचयनात्मक ज्ञान  आदि   विशेषताओं से परिपूर्ण हो गया था.  ब्रह्म समाज के संस्थापक राममोहनराय यूनानी वाद के प्रभाव में थे और हिंदू धर्म की एक सार्वभौमिक व्याख्या की कल्पना करते थे, मगर उनके विचारों को देवेंद्र नाथ टैगोर ने नया दृष्टिकोण देने  और अनेकों सवाल उठा कर वेदों केअधिकार क्षेत्र को सीमित करने का प्रयास किया टैगोर ने ही नव हिंदू धर्म के प्रारूप को लाया जिसेबाद में केशव चंद्र सेन ने आगे  बढ़ाया था.

रामकृष्णन परमहंस से स्वामी विवेकानंद की मुलाकात.

Meeting of Swami Vivekananda and Ramkrishana Paramhansh

नरेंद्र नाथ ने अनेकों सम्माननीय कोलकाता निवासियों से एक ही सवाल किया कि “क्या उन्होंनेभगवान को देखा है ?” मगर वह किसी  के भी जवाब से संतुष्ट नहीं हो पाए,  इसी बीच उनकीमुलाकात   ब्रह्म समाज के नेता देवेंद्रनाथ टैगोर से हुई और वही सवाल स्वामी जी ने देवेंद्र नाथ टैगोरसे भी किया,मगर प्रश्न का जवाब देने की जगह है उन्होंने कहा कि “मेरे बच्चे आपके पास योगी कीआंखें  हैं”.

 मगर आखिर में रामकृष्ण परमहंस ने  उनके सवाल के जवाब  का उत्तर  देते हुए यह कहा”  हां मैंनेउनको देखा है, जैसे कि मैं आपको देख पा रहा हूं, जैसे कि आप मुझे देख पा रहे हैं”. हालांकिनरेन्द्रनाथ दत्त पर ब्रह्म समाज, उसके नए और खुले विचारों का ज्यादा प्रभाव रहा बनिस्पत किरामकृष्ण परमहंस के.  सेन के प्रभाव से ही वह  पाश्चात्य दर्शन के संपर्क में आए और  केशवचंद्र सेनकी वजह से ही उनकी मुलाकात राम कृष्ण परमहंस से होना संभव हुआ.

रामकृष्णन परमहंस और दक्छिणेश्वर से स्वामी विवेकानंद का लगाव

Affection with Ramkrishana Paramhansh and Dakchineswar

1881 में नरेंद्र नाथ दास की मुलाकात रामकृष्ण परमहंस से हुई, जो बाद में उनके आध्यात्मिक गुरुबने.  नरेंद्र नाथ ने पहली बार रामकृष्ण परमहंस के बारे में  एक साहित्यिक प्रवचन के दौरान सुना. जो कि जनरल असेंबली इंस्टिट्यूट मैं आयोजित  था.  इस आयोजन में प्रोफेसर विलियम हिस्टई,   विलियम वर्ड्सवर्थ की कविता “the excursion”  का पाठ कर रहे थे. इसी दौरान वह एकशब्द “trance”  का विस्तार बताते हुए  बोले की, अगर इस शब्द का वास्तविक अर्थ समझना है तोआप लोगों को दक्षिणेश्वर स्थित रामकृष्ण परमहंस के आश्रम जाना चाहिए .

रामकृष्ण परमहंस  से नरेन्द्रनाथ दत्त की पहली मुलाकात  नवंबर 1881 में हुई,  हलाकि नरेन्द्रनाथदत्त ने इसे अपनी पहली मुलाकात नहीं माना. इस दौरान नरेन्द्रनाथ दत्त अपनी एक परीक्षा कीतैयारी कर रहे थे  के अचानक एक दिन  उनके एक रिश्तेदार श्री रामचंद्र दत्त ने उन्हें अपने साथचलने के लिए कहा.  श्री रामचंद्र दत्त और नरेन्द्रनाथ दत्त एक घर में गए जहां रामचंद्र परमहंस प्रवचन के लिए बुलाए गए थे.   इसी मुलाकात के दौरान रामकृष्ण परमहंस ने  नरेंद्र नाथ को गाने केलिए कहा, नरेंद्र नाथ ने गाया तो वह प्रभावित हुए और  उन्हें दक्षिणेश्वर स्थित अपने आश्रम में  आनेका निमंत्रण दिया. इसी साल के अंत में नरेंद्र नाथ दत्त दक्षिणेश्वर स्थित आश्रम गए और रामकृष्णपरमहंस से उनकी मुलाकात हुई,  यही मुलाकात  नरेंद्र नाथ दत्त की जिंदगी को बदल गई.  

प्रारंभिक अवस्था में उन्होंने रामकृष्ण परमहंस को कभी अपना गुरु स्वीकार नहीं किया बल्कि उनकेविचारों  का खुलकर विरोध किया था.  लेकिन धीरे–धीरे नरेंद्र नाथ उनके व्यक्तित्व  एवं विचारों सेप्रभावित होने लगे,   तथा लगातार दक्षिणेश्वर  स्थित आश्रम में आने जाने लगे.

रामकृष्ण परमहंस और स्वामी विवेकानंद

सन 1884 नरेंद्र नाथ के पिता की अचानक मृत्यु ने नरेंद्र नाथ के परिवार को  एक बहुत ही दुखदस्थिति में ला दिया और परिवार लगभग  दिवालियेपन की स्थिति में आकर खड़ा हो गया. लोग अपना उधार मांगने लगे,  इस तरह  बालक नरेंद्र जो कि एक अच्छे और संम्पन परिवार में पैदा हुएथे, गरीबी की स्थिति में आकर खड़े हो गए. उन्होंने कई बार काम खोजने की कोशिश करी औरअसफल रहे,  इसी वजह से भगवान के वजूद पर सवाल खड़े करने लगे  थे. 

एक दिन अचानक नरेंद्र नाथ दत्त मंदिर में गए और रामकृष्ण परमहंस से उन्होंने कहा कि वह मांकाली से मेरे परिवार की वित्तीय स्थिति को सुधारने के लिए प्रार्थना करें,  रामकृष्ण परमहंस ने उन्हेंस्वयं  जाकर प्रार्थना करने को कहा.  नरेंद्र नाथ मंदिर गए उन्होंने कोशिश की मगर सांसारिकआवश्यकताओं की प्रार्थना करने में वह लगभग असफल हो गए.  अंततः मां काली से उन्होंनेअंतर्ज्ञान और भक्ति की प्रार्थना की.(Swami Vivekananda Biography in Hindi)

का रामकृष्ण परहंस को गुरु के रूम में स्वीकार करना.

 नरेंद्र नाथ धीरे धीरे  सब कुछ छोड़ कर लक्ष्मेश्वर स्थित मंदिर आने–जाने लगे और रामकृष्णपरमहंस को उन्होंने अपना गुरु मान लिया. रामकृष्ण परमहंस को 1885  मैं गले का कैंसर  हुआ, नरेंद्र नाथ भी अन्य शिष्यों के साथ रामकृष्ण परमहंस की सेवा में लग गए.  अपनी आध्यात्मिकशिक्षा को जारी रखते हुए उन्होंने निर्विकल्प समाधि को भी महसूस किया. क्योंकि गले के कैंसर  होनेके बाद राम  कृष्ण परमहंस को  आश्रम से  गार्डन हाउस  लाया गया था,  अतः यहीं पर  नरेंद्र नाथदत्त ने अन्य शिष्यों के साथ गेरुआ वस्त्र धारण किया.

“इंसान की सेवा ही भगवान की पूजा है” यह संदेश नरेंद्र नाथ दत्त और अन्य शिष्यों को रामकृष्णपरमहंस ने दिया. रामकृष्ण परमहंस ने अपने आखिरी समय में नरेंद्र नाथ तत्व को आश्रम के अन्यशिष्यों की देखभाल के लिए कहा और सभी शिष्यों को बुलाकर यह कहा कि अब नरेंद्र नाथ दत्त हीआप सब की देखभाल करेंगे. अंततः 16 अगस्त 1886 को  गुरु रामकृष्ण परमहंस समाधि में लीनहो गए.

swami vivekananda biography

तप एवं योग का जीवन

 गुरु रामकृष्ण परमहंस की मृत्यु के पश्चात शिष्यों और अनुयायियों ने आश्रम को समर्थन देना बंदकर दिया और धीरे–धीरे आश्रम की  आर्थिक स्थिति कमजोर होने लगी. जिसकी वजह से शिष्यों नेएक–एक कर आश्रम को अलविदा कह दिया.  मगर नरेंद्र नाथ एवं कुछ अन्य   शिष्यों ने “बारानगर” नामक स्थान पर  एक जीर्ण–शीर्ण घर को किराए पर लेकर  मठ बनाने का फैसला लिया.   पवित्र भिक्षा लेकर एक पुराने लगभग टूट चुके घर को एक मठ में तब्दील किया गया, इस  तरह रामकृष्णमिशन का पहला  आश्रम बनकर तैयार हुआ.  यहीं पर नरेंद्र नाथ और अन्य शिष्यों ने योगाभ्यास, एवं तपस्या करना शुरू किया.  

आश्रम के प्रारंभिक दिनों को याद करते हुए नरेन्द्रनाथ दत्त ने  एक बार कहा “हम उन दिनोंबारानगर स्थित मठ में  अनेकों धार्मिक अभ्यास किया करते थे हम सुबह तीन बजे उठकर जप औरध्यान में लीन हो जाया करते थे. दुनियादारी से एक मजबूत अलगाव की भावना  का विकास हम सबमें हुआ था, उन दिनों हमारे ध्यान में दुनिया है भी या नहीं यह बात नहीं आती थी.

स्वामी विवेकानंद (नरेन्द्रनाथ दत्त) का भारत भ्रमण

एक   दिन नरेंद्र नाथ ने   मठ छोड़ने का फैसला लिया और  1888 में  एक परिव्राजक के रूप में आश्रम को त्याग दिया और एक हिंदू घुमक्कड़ साधु की तरह जीवन जीने लगे. अब उनके पाससंपत्ति के रूप में सिर्फ एक कमंडल और भगवतगीता एवं द लिमिटेशन ऑफ क्राइस्ट नामक धार्मिक किताबें थी.  अगले 5 वर्षों तक नरेंद्र नाथ ने बड़े पैमाने में     लगभग पूरे भारतवर्ष का भ्रमण किया, वह  सभी धर्मों के अनेकों धार्मिक स्थानों पर गए और सभी धार्मिक रीति रिवाजों और परंपराओं काअध्ययन किया.  नरेंद्र नाथ ने गरीब लोगों को देखा उनके जीवन से जुड़ने का प्रयास किया इस तरह,  गरीबी और सामाजिक असमानता को देख कर उनका हृदय द्रवित हो  उठा.  और  आखिरकारउन्होंने समाज  के नव निर्माण का फैसला लिया.

 भिक्षा के सहारे, शिष्यों और   अनुयायियों द्वारा किए गए इंतजाम से उन्होंने पूरे भारत में अलगअलग  वर्गों, सामाजिक, धार्मिक संस्थाओं, सरकारी अधिकारियों, मजदूरों, आदि  से संपर्क  किया, और देश एवं समाज की वस्तुस्थिति को समझने का प्रयास किया. 31 मई 1893 को नरेंद्र नाथ दत्तअपने नए  नाम स्वामी विवेकानंद  ( जो कि उन्हें अजीत सिंह नहीं दिया था) मुंबई से शिकांगो केलिए रवाना हुए.

स्वामी विवेकानंद का विदेश दौरा

स्वामी विवेकानंद  पश्चिमी देशों के  भ्रमण के दौरान  जापान के कई शहरों का दौरा किया जैसे कि,  नागासाकी योकोहामा, ओसाका,  क्यूटो,  टोक्यो आदि  उसके बाद  चीन, कनाडा, अमेरिका  आदिदेशो के भ्रमण में गए.  30 जुलाई 1893 को वह अमेरिका के शिकागो शहर पहुंचे.  वहां सितंबर1893 मैं एक धार्मिक सभा का आयोजन होना था,  जिसमें की विश्व भर के अनेक  धर्मगुरु औरविचारकों को भाग लेना था.  स्वामी विवेकानंद भी इस सभा में भाग लेना चाहते थे लेकिन, धर्म संसदके  एक नियम जिसमें के उस सभा में वही आदमी भाग ले सकता था जो या   तो किसी धर्म का प्रतिनिधित्व करता हो या फिर आधिकारिक तौर पर किसी धर्म संगठन या देश द्वारा भेजा गया हो के कारण स्वामी विवेकानंद को निराश होना पड़ा.

स्वामी विवेकानंद ने   अपने स्वभाव के अनुसार ही काम किया और हार नहीं मानी.  वह  हावर्डयूनिवर्सिटी के प्रोफेसर जॉन हेनरी  से मिले, जिन्होंने स्वामी विवेकानंद को इससे पहले हावर्डयूनिवर्सिटी में बोलने के लिए आमंत्रित किया था. स्वामी विवेकानंद ने प्रोफेसर को एक  पत्र लिखाऔर धर्म संसद में भाग लेने की इच्छा जताई.  स्वामी विवेकानंद ने  अपने आप को एक सनातनी धर्म परंपरा का संत बताया.  ब्रह्म समाज के एक प्रतिनिधि  प्रताप चंद्र मजूमदार जो कि  शिकांगोस्थित धर्म संसद चयन समिति के सदस्य  थे ने स्वामी विवेकानंद को भारतीय  संत परंपरा काप्रतिनिधि बताया. इस तरह उन्हें शिकागो धर्म संसद में बोलने का अवसर  मिला.

विश्व धर्म संसद में स्वामी विवेकानंद

11 सितंबर 1893 को   शिकांगो के  आर्ट इंस्टिट्यूट में धर्म संसद  का आयोजन प्रारंभ हुआ. स्वामीविवेकानंद ने  वाक्य “अमेरिका के भाइयों और बहनों”  से शुरुआत कर हिंदुस्तान और हिंदू धर्म केबारे में व्याख्यान दिया. लगभग 7000 लोगों की भीड़ ने स्वामी विवेकानंद का जोरदार स्वागतकिया.  स्वामी विवेकानंद ने उस सभा में विश्व की सबसे पुरानी और महान संत परंपरा,  वैदिकइतिहास,  भारत के सहिष्णुता  एवं भाईचारे  के बारे में विश्व को परिचित कराया.  धर्म संसद केअध्यक्ष जॉन हेनरी ने कहा, “भारत  जो कि सभी धर्मों की मां है  उसके बारे में  एक गेरुआ वस्त्र धारणकिए हुए संत स्वामी विवेकानंद ने बहुत ही खूबसूरत तरीके से  समझाया, धर्म सभा में उपस्थित सभीलोगों का ध्यान अपनी तरफ खींचा,  यह बहुत ही खूबसूरत था”.  विवेकानंद ने पूरी दुनिया   केपत्रकारों का ध्यान अपनी तरफ खींचा, दुनिया भर  के अखबारों ने उन्हें ” एक चक्रवर्ती भारतीय साधु” कहा.

 न्यूयॉर्क  क्रिटिक नामक अखबार ने लिखा कि स्वामी विवेकानंद एक देवीय अधिकार प्राप्त वक्ताथे,  पीले और नारंगी रंग  मैं रंगा एक बुद्धिमान और ओजस्वी चेहरा उनके शब्दों   से कहीं कम नहींथा.  न्यूयॉर्क हेराल्ड में लिखा” स्वामी विवेकानंद धर्म संसद में निसंदेह सबसे महान व्यक्ति थे, उन्हेंसुनने के बाद हम सब महसूस  कर रहे हैं कि जिस राष्ट्र के पास इतने महान एवं ज्ञानी  संत हैं वहांमिशनरियों को  भेजना एक मूर्खतापूर्ण काम है.  अमेरिकी समाचार पत्रों ने स्वामी विवेकानंद को धर्मसंसद का सबसे लोकप्रिय और प्रभावशाली व्यक्ति बताया.

स्वामी विवेकानंद और अमेरिकी समाज.

 शिकांगो में धर्म सभा को संबोधित करने के बाद स्वामी विवेकानंद अमेरिका के अनेक  शहरों मैंअलग अलग लोगों  और संस्थाओं द्वारा बुलाए गए.   इसी सिलसिले में  ब्रोक्लीन एथिकल सोसाइटी द्वारा आयोजित  एक प्रश्न–उत्तर  सभा के दौरान स्वामी विवेकानंद ने कहा कि ” मेरे पास पश्चिमके लिए एक संदेश है जैसे कि बुद्ध के पास पूर्व के लिए था”

 स्वामी विवेकानंद पूर्वी और मध्य अमेरिका में लगभग 2 वर्ष तक रहे, इस दौरान उन्होंने  अनेकोंसभाओं को संबोधित किया.  उन्होंने अमेरिका स्थित बोस्टन, शिकांगो  आदि शहरों के अनेकों दौरेकिए और महान ज्ञान का विस्तार किया.  सन  1894  मैं स्वामी विवेकानंद ने अमेरिका के न्यूयॉर्कशहर में “वेदांता सोसाइटी” की स्थापना की इस तरह लगातार व्यस्त रहने  की वजह से उनकेस्वास्थ्य पर बुरा असर पड़ा और  उन्हें घूमना फिरना बंद करना पड़ा.  

स्वामी विवेकानंद का पच्शिम दुनिया में फैलाव.

इसके बाद भी उन्होंने योग और वेदांत  के ऊपर व्याख्यान देना नहीं छोड़ा, 1895  मैं लगभग 2 महीने उन्होंने न्यूयॉर्क स्थित थाउजेंड आइसलैंड पार्क  मैं अपने शिष्यों को वेदांत और योग की शिक्षादी. पश्चिमी देशों की अपनी यात्रा के दौरान उन्होंने दो बार इंग्लैंड के दौरे किए, इसी दौरान 1895  मैंउनकी मुलाकात एक आयरिश महिला मार्गरेट एलिजाबेथ नोबल से हुई,  जो बाद में  बहन निवेदिताके नाम से जानी गई.  

इंग्लैंड में अपनी दूसरी यात्रा के दौरान उनकी मुलाकात मैक्स मूलर से हुई जो ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटीमें इंडोलॉजी के विद्वान थे,  जिन्होंने    बाद में रामकृष्ण की बायोग्राफी अंग्रेजी में प्रकाशित की थी. उसके बाद विवेकानंद ने अनेकों यूरोपियन देशों का भ्रमण किया,  उन्हें दो अमेरिकन विश्वविद्यालय, हावर्ड यूनिवर्सिटी  और कोलंबिया यूनिवर्सिटी में पढ़ाने के लिए आमंत्रित कियागया मगर स्वामी विवेकानंद ने इनकार कर दिया, क्योंकि उन्हें लगता था  कि ऐसा करने से संत केरूप में उनके काम में बाधा आएगी. स्वामी विवेकानंद ने अपने  शिष्यों को पारंपरिक हिंदू धर्म केविचारों के बारे में समझाना शुरु किया.  उस समय नए विचारों का बोलबाला था, फिर भी उनके   अनुयायियों की संख्या  एवं     जोश मैं कोई कमी नहीं थी.  स्वामी

स्वामी विवेकानंद का अमेरिकी समाज पर असर

विवेकानंद के विचारों का अमेरिकन समाज मैं असर बढ़ता ही जा रहा था इसका मुख्य कारण स्वामीविवेकानंद द्वारा सुझाए जा रहे  योग अभ्यास और उनका असर था.  1886 में प्रकाशित उनकी एककिताब “राजयोग” ने अपार सफलता प्राप्त की और पश्चिमी सभ्यता के लोगों की योग के प्रतिअवधारणा  को पूरी तरह बदल कर रख दिया. राजयोग के प्रकाशित होने के बाद अमेरिका और अन्ययूरोपीय देशों मे  योगाभ्यास के क्षेत्र में नए आयाम स्थापित हुए जिसका पूरा श्रेय स्वामी विवेकानंदको जाता है.  

स्वामी विवेकानंद ने अनेकों यूरोपियन और अमेरिकन लोगों को अपनी ओर आकर्षित किया,  जिसमें मेरिन लुइस नाम की महिला जो कि फ्रांस से थी  जिनका नाम बाद में  स्वामी अभयानंद पड़ा,  औरलियोन  लैंडसवर्ग जिनका नाम बाद में स्वामी कृपानंद पड़ा  प्रमुख थे.  इन लोगों ने वेदांत सोसाइटीके मिशन को आगे बढ़ाया,  और यह सोसाइटी अब भी लॉस एंजेलिस में अनेकों विदेशी अनुयायियोंसे भरी रहती है.

 स्वामी जी को सैन जोस कैलिफ़ोर्निया मैं वेदांता  सोसायटी के मिशन को आगे बढ़ाने के लिए जमीनभी मिली जिसे अब शांति आश्रम के नाम से जाना जाता है यह साउथ कैलिफोर्निया के 12  मुख्यकेंद्रों में से एक है.  हॉलीवुड में भी एक वेदांता प्रेस है  जहां से वेदांत और हिंदू दर्शन से संबंधित किताबेंप्रकाशित एवं अनुवादित की जाती हैं .  अमेरिका और यूरोपीय देशों में रहते हुए  स्वामी विवेकानंद नेभारतीय दर्शन को नया आयाम दिया.

सामाजिक शिक्षा एवं जरगरूकता के लिए किये गए कार्य.

स्वामी जी भारत में अपने  शिष्यों और अनुयायियों  से लगातार संपर्क में रहते थे और आर्थिक मददभी करते रहते थे. अपने यूरोप प्रवास के दौरान उनके द्वारा लिखे गए पत्रों  से यह साफ है कि वहअपने मिशन को लेकर कितने  सतर्क थे.  ऐसे ही एक पत्र में उन्होंने स्वामी अखंडानंद को लिखा है,  की  खेत्री शहर के घर–घर जाकर गरीब और  पिछले वर्ग के लोगों को  साथ में ले और उन्हें धर्म केबारे में बताएं,  भूगोल जैसे विषयों के बारे मैं उन्हें समझाएं.   उन्होंने कहा की  आलसी बैठे रहने सेऔर राजाओं की तरह  खान–पान से और सिर्फ  जय रामकृष्ण, या हे भगवान कहने से  भगवान कीप्राप्ति नहीं होगी.  अगर  तुम्हें सच में भगवत प्राप्ति का अनुभव करना है तो गरीब और कमजोरलोगों की सेवा करनी होगी, मानवता की सेवा करनी होगी.

स्वामी विवेकानंद ने “द लिमिटेशन ऑफ क्राइस्ट”   के छः अध्याओं का अनुवाद किया जो 1889  “ब्रह्मा विधान” में प्रकाशित हुआ.  स्वामी विवेकानंद अपने शिष्यों  कैप्टन सेवियर  और  जे जे गॉडविन के साथ फ्रांस, इटली और नेपाल होते हुए  30 दिसंबर 1896  को   भारत लौट आए.   कुछसमय बाद सिस्टर निवेदिता भी भारत आ गई और उन्होंने भी अपनी पूरी जिंदगी भारत  मेंमहिलाओं के उत्थान और भारत की आजादी मैं लगा दी.

 स्वामी विवेकानंद भारत में( दिसंबर1896  से जून 1899)

यूरोप से आते  समय स्वामी जी  15 जनवरी 1891  को श्रीलंका पहुंचे,  वहां उनका जबरदस्तस्वागत हुआ और कोलंबो  मैं उन्होंने भाषण दिया. उसके बाद स्वामी विवेकानंद भारत  पहुंचे,  भारतपहुंचते हुए स्वामी विवेकानंद ने अनेक क्षेत्रों का भ्रमण किया,  जैसे कि रामेश्वरम, मदुरई, कुंभकोणम,  मद्रास आदि.  हर जगह उनका जोरदार स्वागत हुआ आम आदमी से लेकर  राजाओं तकने उनके व्याख्यान सुने.  उनकी रेल यात्राओं के दौरान लोग   ट्रेनों को रोक रोक कर उनसे व्याख्यानसुनने के लिए प्रार्थना किया करते थे.  उनकी यात्रा जारी रही, मद्रास  से वह कोलकाता गए  औरउसके बाद “अल्मोड़ा” जो कि  वर्तमान उत्तराखंड में है भी गए.  

अपने यूरोप प्रवास के दौरान स्वामी विवेकानंद ने भारत की महान परंपराओं के बारे में लोगों कोबताया. उन्होंने भारत के सामाजिक आर्थिक चुनोतियों के बारे में समाज को जागृत करने की कोशिशकी, जाती पाती को खत्म करने,  विज्ञान को आगे बढ़ाने,  उद्योग–धंधों को बढ़ाने, सामंती प्रथा कोखत्म करने  तथा गरीबी और भुखमरी को खत्म करने  के लिए अनेकों व्याख्यान दिए.  स्वामीविवेकानंद एक महान समाज सुधारक,  एक बेहतरीन गुरु,  एक संवेदनशील  संत,  और एक ओजस्वीवक्ता थे.

“स्वामी विवेकानंद के द्वारा कोलंबो मै दिए गए व्याख्यान एक किताब  “लेक्चर्स फ्रॉम कोलंबो टू अल्मोड़ा”  मै संकलित हैं.   यह  संकलन उनके राष्ट्रप्रेम और आध्यात्मिक  विचारधारा  को आज भी  उसी तरह प्रचारित-प्रसारित कर रहा है”.

स्वामी विवेकानंद द्वारा रामकृष्ण मिशन की स्थापना

 स्वामी विवेकानंद ने 1 मई 1897  को “रामकृष्ण मिशन”  की  स्थापना की थी. इस मिशन कीअवधारणा कर्मयोग पर आधारित है और, और यह “रामकृष्ण मठ  ट्रस्ट”  द्वारा शासित है.  रामकृष्ण मिशन और रामकृष्ण मठ,  दोनों का   मुख्यालय कोलकाता    स्थित   बेलूर मठ है.   स्वामी विवेकानंद ने दो अन्य मठों की स्थापना की थी जिसमें से एक “अद्वैत आश्रम”  उत्तराखंडके  चंपावत मै “मायावती” नामक स्थान पर स्थित है. अद्वैत आश्रम  की स्थापना 19 मार्च 1899 को स्वामी विवेकानंद की आज्ञा   पाकर उनके एक शिष्य जेम्स हेनरी ने की थी, जबकि दूसरा आश्रममद्रास में स्थित है.

“स्वामी विवेकानंद से प्रेरणा  पाकर  ही जमशेदजी टाटा ने वर्तमान कर्नाटक के बेंगलुरु में एक रिसर्च और शैक्षणिक संस्थान की स्थापना की थी जो कि वर्तमान में इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ  साइंस के नाम से जाना जाता है”

स्वामी विवेकानंद की दूसरी यूरोप यात्रा  और  वापसी

जून 1899  को स्वामी जी    अपने  अपनी शिष्य  सिस्टर निवेदिता के साथ दुबारा यूरोप की यात्रा परनिकल गए.  वह इंग्लैंड होते हुए दोबारा संयुक्त राज्य अमेरिका पहुंच गए.  अपनी इस यात्रा के दौरानस्वामी विवेकानंद ने  न्यूयॉर्क और सैन फ्रांसिस्को मैं “विधान सोसाइटी” की स्थापना की तथाकैलिफोर्निया में “शांति आश्रम” बनवाया उसके बाद एक धार्मिक आयोजन के लिए वह पेरिस की ओररवाना हो गए,  पेरिस में  स्वामी विवेकानंद ने शिवलिंग की पूजा और श्रीमद्भगवद्गीता के ऊपरव्याख्यान दिए.   तत्पश्चात स्वामी विवेकानंद वियना होते हुए  इस्तांबुल, एथेंस और इजिप्ट  भीगए. 9 दिसंबर 1900 स्वामी विवेकानंद भारत लौट आए.

स्वामी विवेकानंद मायावती स्थित अद्वैत आश्रम में.

उसके बाद स्वामी विवेकानंद  “चंपावत”  के मायावती  स्थित अद्वैत आश्रम गए, और बेलूर मठ मेंरहने लगे. जहां से उन्हों ने लगातार रामकृष्ण मिशन के कामों की देखभाल की उनको आगे बढ़ाया.  यहीं रहते हुए उन्होंने इंग्लैंड और अमेरिका स्थित  अपने कार्यों को अपने अनुयायियों के साथ आगेबढ़ाने का काम किया.  इसी दौरान वह कई बीमारियों की चपेट में आ गए और उनका स्वास्थ्य धीरे–धीरे खराब होने लगा.  खराब स्वास्थ्य के बावजूद उन्होंने बोधगया और वाराणसी की यात्रा की . धीरेधीरे उनके   खराब स्वास्थ्य के कारण उनकी यात्राएं कम होने लगी और उन्होंने अपने आप कोवेल्लूर मठ तक ही सीमित कर लिया.

स्वामी विवेकानंद की मर्त्यु/महासमाधि

स्वामी विवेकानंद ने पूरी दुनिया में घूम–घूम कर गरीबी, असमानता, अशिक्षा, एवं कुरीतियों केखिलाफ अनेकों कार्य किए.  समाज की सेवा के क्षेत्र में किए गए उनके  कार्यों के कारण भारत मैंअनेक क्षेत्रों में जन जागरण का  प्रसार हुवा. और समाज का उत्थान  हुआ.  लेकिन नियति के आगेबेबस होकर 4 जुलाई 1914 को स्वामी विवेकानंद ने अपने प्राण त्याग दिए. 4 जुलाई 1914 के दिनस्वामी विवेकानंद सुबह जल्दी उठकर बेलूर मठ गए और 3 घंटे तक ध्यान किया. अपने शिष्यों कोसंस्कृत व्याकरण एवं दर्शन का पाठ पढ़ाया तथा उन्होंने अपने साथियों के साथ वैदिक कॉलेज कीस्थापना की योजना पर चर्चा की.  

शाम के सात बजे के समय स्वामी विवेकानंद  अपने शिष्यों को आदेश दिया कि उन्हें डिस्टर्ब न कियाजाए और अपने कमरे में चले गए.  रात के करीब 9:20  पर जब स्वामी विवेकानंद ध्यान में लीन थेनिर्माण को प्राप्त हो गए. स्वामी जी के शिष्यों का कहना  था कि वह महासमाधि में लीन हो गए, चिकित्सा जांच के अनुसार उनके   सिर्  की एक नस के फट जाने के कारण  उनकी मृत्यु हुई थी.

भारत के लिए स्वामी विवेकानंद का योगदान

स्वामी विवेकानंद केवल संत नहीं थे; वह एक महान राष्ट्रभक्त,  विचारक,  और नयेपन के  ध्वजवाहक भी थे.  उस  समय के भारतीय समाज को स्वामी जी ने बहुत हद तक अपने विचारों सेप्रभावित कर प्रगतिशील कार्यों की ओर लगाया था.  भारत की धरती के लिए स्वामी विवेकानंद ईश्वरद्वारा भेजे गए  एक फ़रिश्ते की तरह  थे, उनके द्वारा किए गए कार्यों की  बदौलत और उनके द्वारासुझाए गए मार्गों मैं चल कर भारत दुनियाभर में महान देश की अपनी एक कल्पना को साकार रुपदेने में लग गया था. भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन में स्वामी जी की भूमिका एक मार्गदर्शक, एकविचारक के रूप में थी.

विवेकानंद ने देश की जनता को नए रास्तों की ओर बढ़ने के लिए प्रेरित किया. एक नैतिक जनसमूहतैयार कर स्वामी विवेकानंद ने भारतीय स्वाधीनता आंदोलन को एक महान  नैतिक हथियार एवंताकत प्रदान की, उनके द्वारा दी गई प्रेरणा की वजह से ही महात्मा गांधी  जी को  स्वतंत्रताआंदोलन में अपार  जनसमर्थन  मिला.  

स्वामी विवेकानंद का विश्वास था कि भारतवर्ष एक महान भूमि  है,  इसी भूमि ने अनेकों महान ऋषिमुनियों, त्यागियों,  सन्यासियों को जन्म दिया है,  भारतवर्ष में ही आदिकाल से लेकर हमेशा तक केलिए मनुष्य के लिए मुक्ति   के  खुले हुए हैं.  उन्होंने लोगों को संदेश दिया कि “उठो जागो और तबतक चलते रहो जब तक की लक्ष्य की प्राप्ति नहीं हो जाती”. भारतीय दर्शन की उनकी समझ में कोई संदेहात्मक विषय नहीं था.  आडंबरों से दूर,  स्वच्छ, न्यायपूर्ण एवं समानता पूर्ण समाज  कीस्थापना ही उनके लिए धर्म  का वास्तविक उद्देश्य था.  आडंबरों से घिरे हुए,  गरीबी एवं भुखमरी सेत्रस्त समाज को देख कर स्वामी विवेकानंद का मन खिन्नता से भर जाता था.  

आडंबरों एवं कुरीतियों को लेकर स्वामी विवेकानंद रूख.

अनेकों बार उस युवा संन्यासी    ने  अजीब एवं अच्छी लगने वाली,  तात्कालिक भारतीय समाज की रीति रिवाजों पर कड़े प्रहार किए,  मूर्ति पूजा के खिलाफ उनके बयान किसी विद्रोही के बयान की तरह होते थे.   वह कहा करते थे की 33 करोड़  देवी देवताओं को उनके स्थान से निकालकर 33 करोड़ गरीब एवं कमजोर लोगो  को वहां बैठा देना चाहिए.   स्वामी विवेकानंद के कालजई भाषण एवं बयान 19वीं शताब्दी के अंत तक भारतीय पुरोहितों एवं  सामंतवादी लोगों के मन में भयानक  किस्म का डर भर दिया था. उनका विश्वास था कि पूरी धरती में यदि कोई देश है जिसमें  मानव ईमानदार कोशिश  कर हर असंभव को संभव कर सकता है तो वह भारत ही है.

स्वामी विवेकानंद का विश्व समाज के लिए योगदान.

स्वामी विवेकानंद एक महान संत तो थे ही, साथ ही वह एक घुमक्कड़ किस्म के इंसान भी थे. अपनेमहान बिचारो और ज्ञानपूर्ण भासणो की बजह से स्वामी विवेकानंद ने विश्व ज्ञान समुदाय में अपनीमत्यपूर्ण जगह बना ली थी. दुनिया के कोने कोने से लोग उनको अपने यह होने वाले आयोजनों मेंआमंत्रित किया करते थे. इस तरह स्वामी विवेकानंद ने पूरी दुनिया में घूम –घूम कर, वेदांत, गीतासहित अनेक महान भारतीय ज्ञान को विश्व समुदाय को बांटा. जिससे पुरे विश्व समाज को लाभहुवा.

इसके अतरिक्त स्वामी विवेकानंद ने विश्व समुदाय, विषेकर युवाओ से नयेपन स्वीकारने औरसमाज को अधिक सवेदन शील बनाने का आवाह्न किया. स्वामी विवेकानद पूर्व से लेकर पच्छिमतक के अनेक देशो और विभन्न सहरो में घूम कर समाज को नवजागरण और आत्मिक उत्थान केलिए प्रेरित किया. योग एवं ध्यान के छेत्र में स्वामी विवेकानंद द्वारा किये गए कार्यो की वजह सेविश्व बिरादरी को बहुत लाभ हुवा.

स्वामी विवेकानंद के अनमोल वचन

  • मैं सिर्फ और सिर्फ प्रेम की शिक्षा देता हूं और मेरी सारी शिक्षा के उन महान सत्य पर आधारित है जो हमें समानता और आत्मविश्वास की सभ्यता का ज्ञान देती है .
  • आप को 33 करोड़ देवी-देवताओं पर भरोसा है लेकिन खुद पर नहीं  तो आपको मुक्ति नहीं मिल सकती खुद पर भरोसा रखो अडिग रहें और मजबूत बने हमें इसकी  जरूरत है.
  •  सफलता के तीन आवश्यक अंग है शुद्धता, धैर्य और दृढ़ता लेकिन इन सब से बढ़कर जो आवश्यक है वह है प्रेम.
  • उत्तिष्ठत जाग्रत प्राप्य वरान्निबोधत,  उठो जागो और लक्ष्य प्राप्ति तक रुको मत.
  •  जब तक आप खुद पर विश्वास नहीं करते तब तक आप भगवान पर विश्वास नहीं कर सकते.
  •  सत्य को हजार तरीकों से बताया जा सकता है फिर भी हर  एक   सत्य होगा.
  •  खुद को कमजोर समझना सबसे बड़ा पाप है .
  •  मनुष्य की सेवा करो भगवान की सेवा करो.
  •  कुछ मत पूछो बदले में कुछ मत मांगो जो देना है वह दो वह तुम तक वापस आएगा पर उसके बारे में अभी मत सोचो.
  • शारीरिक बौद्धिक और आध्यात्मिक रूप से जो कोई भी कमजोर बनता है उसे जहर की तरह त्याग दो.
  • एक समय में एक काम करो और ऐसा करते समय अपनी पूरी आत्मा उसमे डाल दो और बाकी सब कुछ भूल जाओ.
  •  सबसे बड़ा धर्म है अपने स्वभाव के प्रति सच्चे होना स्वयं पर विश्वास करो.
  •  किसी चीज से डरो मत, तुम अद्भुत काम करोगे यह निर्भयता ही है जो क्षण भर में परम आनंद लाती है.
  •  स्वतंत्र होने का साहस करो, जहां तक तुम्हारे विचार आते हैं वहां तक आने का  प्रयास करो, उन्हें अपने जीवन में उतारने का प्रयास करो.

स्वामी विवेकानंद द्वारा लिखा गया साहित्य

संगीत कल्पतरु, कर्मा योग, राज योग, वेदांत फिलॉसफी, माय मास्टर, लेक्चर फ्रॉम कोलोंबो तो अल्मोड़ा, जन योग, वर्तमान भारत.

स्वामी विवेकानंद की प्रेरणादायक जीवनी, कुछ मत्वपूर्ण तिथियां.

(swami vivekananda biography in hindi)

  • जन्म                                                                12 जनवरी 1863 कलकत्ता में.
  • पिता का नाम                                                     श्री विश्वनाथ दत्त
  • माता का नाम                                                     श्रीमती भुवनेश्वरी देवी
  • स्नातक की उपाधि-                                             1884 (कला)
  • विश्व धर्म सम्मेलन, शिकागो में प्रथम व्याख्यान   11 सितम्बर 1893
  • रामकृष्ण मिशन की स्थापना                                1 मई 1897
  • मायावती में अद्वैत आश्रम की स्थापना                 19  मार्च 1899
  • मायावती की यात्रा                                                10 जनवरी 1901
  • महासमाधि                                                         4 जुलाई 1902

स्वामी विवेकानंद से सम्बंधित महत्वपूर्ण स्थान

  • अद्वैत आश्रम                                                        मायावती, चम्पावत (उत्तराखंड)
  • बेल्लूर मठ                                                             कोलकत्ता, पच्छिम बंगाल
  • रामकृष्ण  मठ- बारानगर                                         बारानगर कोलकाता.
  • थियोसोफिकल सोयसायटी                                       अड्यार, मद्रास  (चेन्नई)
  • जनरल असेंबली  इंस्टीटूशन                                     कोलकत्ता
  • वेदांत सोसायटी                                                       न्यू यार्क
  • थाउजेंड आइसलैंड पार्क                                             न्यू यार्क
Swami vivekananda biography in hindi by HindiWall