डर लगता है

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सोचा आऊ तुम्हारे पास तुम्हारे साये को महसूस करने,

पर ना जाने क्यों तुम्हारी खुशबुओं मे खोने का डर लगता है,

सोचा बस मुस्कुराऊँ तुम्हे देखकर पर

ना जाने क्यों तुम्हारी हर मुस्कराहट के दायरे मे खो जाने से डर लगता है,

सोचा कह दूँ तुम्हे अपने दिल की हर बात,

पर ना जाने क्यों तुम्हारी बातों मे खोने का डर लगता है,

सोचा देखूं तुम्हें जी भरकर, प्यार से निहारकर,

पर न जाने  क्यों इन आँखों की गहराइयों मे खो जाने से डर लगता हैं,

सोचा छू लूँ तुम्हारे नाजुक हाथों को,

पर न जाने  क्यों उस स्पर्श मै खुद के खो जाने का डर लगता हैं,

 सोचा खो जाऊ तुम्हारी बाहों के घेरे मे,

 पर न जाने  क्यों तुम्हारे दायरे में सिमटने से डर लगता है,

 सोचा देखूं तुम्हें ख्वाब के हर पहलु मे,

पर न जाने क्यों तुम्हारा हर सपना टूटने का डर लगता है,

 सोचा महसूस करू तुम्हारे अपनत्व को,

पर न जाने  क्यों इस प्यार मे ज़िन्दगी गुज़र जाने से डर  लगता है।


हिन्दीवाल के लिए इस कविता “डर  लगता है ” के लेखक का नाम गरिमा पांडेय डंगवाल है . हल्द्वानी (उत्तराखंड) में रहतीं है. अध्ययन, लेखन एवं संगीत में रूचि रखतीं है।

garima pande poem

 

 

 

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