गरीब की याददास्त

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गरीब की याददास्त

गरीब के पास कुछ भी कीमती नहीं होता
मगर एक चीज़ होती है….”उसकी याददास्त”
वो याद रख सकता है …….हर दौर की रहनुमाई को
वो याद रख सकता है…उस एक दिन को भी जब उसने ठाठ किये होंगे

गरीब की ये याददास्त …बड़े-बड़े रहनुमाओं को जमीजोद करने के लिए काफी है
उसे जब- कभी भी याद आतीं हैं यातनाये … याद आते है बड़े -बड़े महल भी
उसकी यादें जिन्दा रहती है …….बारूद का बीज बनकर…. पीढ़ी-दर-पीढ़ी
दुनिया में हुवे महान परिवर्तन परिणाम है इन्ही यादों के
इन्ही बारूदी बीजों ने ….बरगद बनकर राजमहलों बीचों-बीच फाड़ा है कई बार …….

जरूर …..कुछ भूल भी सकता हैं एक गरीब …….
मगर नहीं भूलता उसे ….जिसने उसे सर आखों पर रखा था कभी …..
जिसने बताया था रास्ता …… कि उजाला इस तरफ से आएगा
और कहा था कि …….सूरज तेरे लिए भी उगेगा ….
धूप में तेरा भी हिस्सा बराबर का हैं………..

इसलिए रहनुमाओं को चाहिए कि …जब कभी भी उतरें जमीन पर
अपनी पतलूनों को कस कर बांध लेना न भूलें……


हिन्दीवाल के ये पंक्तिया रोहित गड़कोटी ने लिखी हैं . अल्मोड़ा (उत्तराखंड) में रहते है. हिन्दीवाल ब्लॉग में संपादन का कार्य भी करते है.

poem by rohit garkoti

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