स्वामी विवेकानंद की प्रेरणादायक जीवनी (Swami Vivekananda Biography in Hindi)

Swami vivekananda biography in hindi.  उत्तिष्ठत जाग्रत प्राप्य वरान्निबोधत”अर्थात “उठो, जागो और लक्ष्य की प्राप्ति तक रुको मत”.  इस तरह के महान विचारों के प्रचारकस्वामी विवेकानंद हमारे देश की महान विभूतियों में से एक हैं. स्वामी विवेकानंद ने पूरे भारतीयउपमहाद्वीप एवं संसार में घूम– घूम कर, मानवता की सेवा एवं विश्व के कल्याण के लिए कार्यकिया. भारतीय दर्शन को पुरे संसार में पहचान दिलाने में स्वामी जी की महत्वपूर्ण भूमिका रही हे. स्वामी विवेकानंद ने धर्म की आड़ में की जा रही कुप्रथाओ के खिलाप बोला. समाज में फैले तरह – तरह की कुरीतियों को ख़तम करने एवं समाज को नए रस्ते पर ले जाने का कार्य बड़ी ही कुशलता–पूर्वक किया.

स्वामी जी परगतिशीलता को अपनाने पर बल देते थे और भारतीय दर्शन एवं संस्कृति को प्रगतिशीलबिचारों का वाहक मानते थे. योग एवं ध्यान के एक अलग प्रारूप को दुनिया के सामने लाकर, स्वामीविवेकानंद ने मानव जीवन को एक नयी राह दिखाई. स्वामी विवेकानंद आध्यात्मिक उत्थान,  आत्मिक सुधार, कर्मयोग एवं  ज्ञानयोग के महानतम सिद्धांतों के प्रतिपादक भी थे.  उन्होंने 1893 में अमेरिका के शिकागो में हिंदू दर्शन के ऊपर व्याख्यान दिया जो उस समय बहुत सराहा गया. स्वामी विवेकानंद को भारतीय दर्शन, योग एवं वेदों  के  सार को पश्चिमी सभ्यता तक  पहुंचाने  में दिए गए योगदान  के लिए हमेशा याद किया जाता है. हिंदू धर्म को विश्व में पहचान दिलाने मेंस्वामी विवेकानंद की महत्वपूर्ण भूमिका है. उन्होंने बिखरे हुए भारतीय समाज में राष्ट्रीयता कीभावना को जागृत कर भारत के एकीकरण के लिए भी बहुत से प्रयास किए.

भारत के स्वाधीनता आंदोलन के बिचारकों एवं स्वाधीनता आंदोलन के प्रारूप पर गौर करने परस्वामी विवेकानंद की छाप स्पस्ट देखि जा सकती है. एक कुलीन परिवार में पैदा होने के बाद भी आध्यात्म की तरफ उनका झुकाव चौका देने वाला था.  भारतीय संत परंपरा के महानतम संत थे. गुरु रामकृष्ण परमहंस के प्रभाव में आने के बाद स्वामी विवेकानंद मानवता की सेवा को ही अपनाधर्म समझने लगे थे.  हिंदू धर्म के पुनरुत्थान के लिए किए गए कार्यों  के कारण ही स्वामी विवेकानंदजी का स्थान हिंदू धर्म में  पूज्यनीय है. भारतीय परंपरा में उन्हें ए0क राष्ट्रभक्त संत के रूप में जानाजाता है एवं  युवाओं के बीच में  स्वामी विवेकानंद एक आदर्श की तरह हमेशा जिंदा है.

“स्वामी विवेकानंद का जन्म दिवस अर्थात  12 जनवरी भारत में युवा दिवस के रुप में मनाया जाताहै”.

स्वामी विवेकानंद (नरेन्द्रनाथ दत्त) का प्रारंभिक जीवन

Initial Life of Swami Vivekananda (Narendranath Datt)

स्वामी विवेकानंद का जन्म 12 जनवरी 1863 को कोलकाता , जो कि उस समय ब्रिटिश साम्राज्य कीराजधानी था के एक संपन्न कायस्थ, बंगाली परिवार में हुआ था. उनके बचपन का नाम  नरेंद्रनाथदत्त था. उनके पिता श्री विश्वनाथ कोलकाता हाईकोर्ट मैं अटॉर्नी  थे, तथा नरेन्द्रनाथ दत्त के दादाश्री दुर्गाचरण दत्त संस्कृत और फारसी के महान विद्वान थे.  श्री दुर्गा चरण दत्त ने 25 वर्ष कीअवस्था में अपने परिवार का त्याग कर सन्यास ग्रहण कर लिया था, नरेन्द्रनाथ दत्त  जी की माता श्रीमती भुवनेश्वरी देवी एक धार्मिक किस्म की घरेलू महिला  थी.

पिता के प्रगतिशील विचार एवं माता  के धार्मिक स्वभाव का बालक नरेंद्र नाथ दत्त पर गहरा प्रभावपड़ा, नरेंद्र नाथ बचपन से ही आध्यात्म के रास्ते पर चल पड़े थे. बहुत ही कम उम्र से वह शिव, श्रीराम,  सीता  आदि की  मूर्तियों के सामने योग साधना एवं अभ्यास करने  लगे. हालांकि अपने बचपनमैं बालक नरेंद्रनाथ दत्त बहुत ही नटखट स्वभाव  के थे,  कई बार उनके माता–पिता को उन्हेंसमझाना–बुझाना मुश्किल हो  जाता था,  यहां तक  की उनकी माता जी श्रीमती भुवनेश्वरी देवी कहांकरती थी, मैंने भगवान से एक पुत्र की कामना की थी मगर भगवान ने मुझे  अपना एक राक्षस भेजदिया. (Swami Vivekananda Biography in Hindi)

स्वामी विवेकानंद का स्कूली शिक्षा जीवन.

(School Life and Education of Swami Vivekananda)

 सन 1871 में नरेन्द्रनाथ दत्त के  8 साल के थे  तब उनका दाखिला ईश्वर चंद्र विद्यासागरमेट्रोपोलिटन इंस्टीट्यूट में करवाया गया. वहां उन्होंने 1877 तक शिक्षा हासिल की, उसके बादउनका परिवार रायपुर आ गया 1879 में उनका परिवार  पुनः कोलकाता वापस आ गया.  प्रेसिडेंसीकॉलेज कोलकाता  की प्रवेश परीक्षा  को प्रथम श्रेणी से उत्तीर्ण करने के पश्चात नरेन्द्रनाथ दत्त  नेउच्च शिक्षा की शुरुआत की.

 नरेन्द्रनाथ दत्त एक मेधावी छात्र थे. साइकोलॉजी,  इतिहास, धर्म, समाज–विज्ञान,  कला, एवंसाहित्य जैसे विषयों पर उनकी मजबूत पकड़ थी. साथ ही भगवत गीता, वेद, उपनिषद, महाभारत, रामायण, पुराण आदि का अध्ययन भी नरेन्द्रनाथ दत्त ने बहुत ही रुचि के साथ किया. अपने कॉलेजके दिनों में नरेन्द्रनाथ दत्त खेलकूद, भारतीय शास्त्रीय संगीत  तथा पश्चिमी सभ्यता से संबंधितसिद्धांतों,   दर्शन, इतिहास मैं गहरी रुचि रखते थे. एवं इन सब से संबंधित आयोजनों में बढ़ चढ़करहिस्सा लिया करते थे.

कोलकाता स्थित जनरल असेंबली इंस्टिट्यूट  जो  की अब स्कॉटिश चर्च कॉलेज के नाम से जानाजाता है से नरेन्द्रनाथ दत्त ने पश्चिमी दर्शन इतिहास में  आगे की पढ़ाई की थी.  इसी कॉलेज मेंनरेन्द्रनाथ दत्त ने डेविड ह्यूम, जॉर्ज डब्ल्यू एफ हेगल, अगस्त काम्टे, जॉन स्टुअर्ट मिल, चार्ल्सडार्विन आदि के कार्यों के बारे में विशेष रुप से अध्ययन किया.   हर्बर्ट  स्पेंसर के काम से वह काफीप्रभावित हुए तथा उनकी किताब “एजुकेशन” का बंगाली में अनुवाद भी नरेन्द्रनाथ दत्त ने किया. यही नहीं संस्कृत और बंगाली भाषा  और साहित्य का भी उन्होंने गहन अध्ययन किया था. जनरलअसेंबली इंस्टिट्यूट के प्रिंसिपल विलियम हेस्टई  ने नरेंद्र नाथ दत्त के बारे में लिखा है, “नरेंद्रवास्तव में बुद्धिमान है,  मैं बहुत दूर–दूर तक घूम चुका हूं लेकिन इस तरह की योग्यता और प्रतिभामैंने कहीं नहीं देखी मैं जर्मन की यूनिवर्सिटी में  भी रहा और भी कई जगह”.

स्वामी विवेकानंद का शिक्षा के बाद का शुरुआती जीवन.

Life of Swami Vivekananda after Education

नरेंद्र नाथ दास सन 1880 में नव विधान जोकि केशवचंद्र सेन की एक संस्था थी  के साथ जुड़ गए,  नव विधान की स्थापना केशवचंद्र सेन ने रामकृष्ण से मिलने के बाद की थी, जब वह क्रिश्चियन धर्मसे पुनः वापस हिंदू धर्म में परिवर्तित हो रहे थे. नरेन्द्रनाथ दत्त ब्रह्मा समाज में भी लंबे समय तकसक्रिय रहे तथा  “सेन की बैंड ऑफ होप”  नामक संस्था के साथ भी उन्होंने काम किया   इस संस्था  के जरिये युवाओं को धूम्रपान और शराब से दूर रहने के लिए प्रेरित करते थे.

ब्रम्हा समाज और स्वामी विकेकानंद

Bramha Samaj and Swami Vivekananda

नरेन्द्रनाथ दत्त के जीवन में ब्रह्म समाज की अवधारणाओं का असर रहा.  जिसके कारण  मूर्ति पूजाऔर निराकार देवता तथा अन्य बहुत से आडंबरों   जो  कि  उस समय समाज में  प्रचलित थे काउन्होंने हमेशा विरोध किया. उनका जीवन आधुनिक तर्कसंगत, वैज्ञानिक अध्यात्मवाद औरचयनात्मक ज्ञान  आदि   विशेषताओं से परिपूर्ण हो गया था.  ब्रह्म समाज के संस्थापक राममोहनराय यूनानी वाद के प्रभाव में थे और हिंदू धर्म की एक सार्वभौमिक व्याख्या की कल्पना करते थे, मगर उनके विचारों को देवेंद्र नाथ टैगोर ने नया दृष्टिकोण देने  और अनेकों सवाल उठा कर वेदों केअधिकार क्षेत्र को सीमित करने का प्रयास किया टैगोर ने ही नव हिंदू धर्म के प्रारूप को लाया जिसेबाद में केशव चंद्र सेन ने आगे  बढ़ाया था.

रामकृष्णन परमहंस से स्वामी विवेकानंद की मुलाकात.

Meeting of Swami Vivekananda and Ramkrishana Paramhansh

नरेंद्र नाथ ने अनेकों सम्माननीय कोलकाता निवासियों से एक ही सवाल किया कि “क्या उन्होंनेभगवान को देखा है ?” मगर वह किसी  के भी जवाब से संतुष्ट नहीं हो पाए,  इसी बीच उनकीमुलाकात   ब्रह्म समाज के नेता देवेंद्रनाथ टैगोर से हुई और वही सवाल स्वामी जी ने देवेंद्र नाथ टैगोरसे भी किया,मगर प्रश्न का जवाब देने की जगह है उन्होंने कहा कि “मेरे बच्चे आपके पास योगी कीआंखें  हैं”.

 मगर आखिर में रामकृष्ण परमहंस ने  उनके सवाल के जवाब  का उत्तर  देते हुए यह कहा”  हां मैंनेउनको देखा है, जैसे कि मैं आपको देख पा रहा हूं, जैसे कि आप मुझे देख पा रहे हैं”. हालांकिनरेन्द्रनाथ दत्त पर ब्रह्म समाज, उसके नए और खुले विचारों का ज्यादा प्रभाव रहा बनिस्पत किरामकृष्ण परमहंस के.  सेन के प्रभाव से ही वह  पाश्चात्य दर्शन के संपर्क में आए और  केशवचंद्र सेनकी वजह से ही उनकी मुलाकात राम कृष्ण परमहंस से होना संभव हुआ.

रामकृष्णन परमहंस और दक्छिणेश्वर से स्वामी विवेकानंद का लगाव

Affection with Ramkrishana Paramhansh and Dakchineswar

1881 में नरेंद्र नाथ दास की मुलाकात रामकृष्ण परमहंस से हुई, जो बाद में उनके आध्यात्मिक गुरुबने.  नरेंद्र नाथ ने पहली बार रामकृष्ण परमहंस के बारे में  एक साहित्यिक प्रवचन के दौरान सुना. जो कि जनरल असेंबली इंस्टिट्यूट मैं आयोजित  था.  इस आयोजन में प्रोफेसर विलियम हिस्टई,   विलियम वर्ड्सवर्थ की कविता “the excursion”  का पाठ कर रहे थे. इसी दौरान वह एकशब्द “trance”  का विस्तार बताते हुए  बोले की, अगर इस शब्द का वास्तविक अर्थ समझना है तोआप लोगों को दक्षिणेश्वर स्थित रामकृष्ण परमहंस के आश्रम जाना चाहिए .

रामकृष्ण परमहंस  से नरेन्द्रनाथ दत्त की पहली मुलाकात  नवंबर 1881 में हुई,  हलाकि नरेन्द्रनाथदत्त ने इसे अपनी पहली मुलाकात नहीं माना. इस दौरान नरेन्द्रनाथ दत्त अपनी एक परीक्षा कीतैयारी कर रहे थे  के अचानक एक दिन  उनके एक रिश्तेदार श्री रामचंद्र दत्त ने उन्हें अपने साथचलने के लिए कहा.  श्री रामचंद्र दत्त और नरेन्द्रनाथ दत्त एक घर में गए जहां रामचंद्र परमहंस प्रवचन के लिए बुलाए गए थे.   इसी मुलाकात के दौरान रामकृष्ण परमहंस ने  नरेंद्र नाथ को गाने केलिए कहा, नरेंद्र नाथ ने गाया तो वह प्रभावित हुए और  उन्हें दक्षिणेश्वर स्थित अपने आश्रम में  आनेका निमंत्रण दिया. इसी साल के अंत में नरेंद्र नाथ दत्त दक्षिणेश्वर स्थित आश्रम गए और रामकृष्णपरमहंस से उनकी मुलाकात हुई,  यही मुलाकात  नरेंद्र नाथ दत्त की जिंदगी को बदल गई.  

प्रारंभिक अवस्था में उन्होंने रामकृष्ण परमहंस को कभी अपना गुरु स्वीकार नहीं किया बल्कि उनकेविचारों  का खुलकर विरोध किया था.  लेकिन धीरे–धीरे नरेंद्र नाथ उनके व्यक्तित्व  एवं विचारों सेप्रभावित होने लगे,   तथा लगातार दक्षिणेश्वर  स्थित आश्रम में आने जाने लगे.

रामकृष्ण परमहंस और स्वामी विवेकानंद

सन 1884 नरेंद्र नाथ के पिता की अचानक मृत्यु ने नरेंद्र नाथ के परिवार को  एक बहुत ही दुखदस्थिति में ला दिया और परिवार लगभग  दिवालियेपन की स्थिति में आकर खड़ा हो गया. लोग अपना उधार मांगने लगे,  इस तरह  बालक नरेंद्र जो कि एक अच्छे और संम्पन परिवार में पैदा हुएथे, गरीबी की स्थिति में आकर खड़े हो गए. उन्होंने कई बार काम खोजने की कोशिश करी औरअसफल रहे,  इसी वजह से भगवान के वजूद पर सवाल खड़े करने लगे  थे. 

एक दिन अचानक नरेंद्र नाथ दत्त मंदिर में गए और रामकृष्ण परमहंस से उन्होंने कहा कि वह मांकाली से मेरे परिवार की वित्तीय स्थिति को सुधारने के लिए प्रार्थना करें,  रामकृष्ण परमहंस ने उन्हेंस्वयं  जाकर प्रार्थना करने को कहा.  नरेंद्र नाथ मंदिर गए उन्होंने कोशिश की मगर सांसारिकआवश्यकताओं की प्रार्थना करने में वह लगभग असफल हो गए.  अंततः मां काली से उन्होंनेअंतर्ज्ञान और भक्ति की प्रार्थना की.(Swami Vivekananda Biography in Hindi)

का रामकृष्ण परहंस को गुरु के रूम में स्वीकार करना.

 नरेंद्र नाथ धीरे धीरे  सब कुछ छोड़ कर लक्ष्मेश्वर स्थित मंदिर आने–जाने लगे और रामकृष्णपरमहंस को उन्होंने अपना गुरु मान लिया. रामकृष्ण परमहंस को 1885  मैं गले का कैंसर  हुआ, नरेंद्र नाथ भी अन्य शिष्यों के साथ रामकृष्ण परमहंस की सेवा में लग गए.  अपनी आध्यात्मिकशिक्षा को जारी रखते हुए उन्होंने निर्विकल्प समाधि को भी महसूस किया. क्योंकि गले के कैंसर  होनेके बाद राम  कृष्ण परमहंस को  आश्रम से  गार्डन हाउस  लाया गया था,  अतः यहीं पर  नरेंद्र नाथदत्त ने अन्य शिष्यों के साथ गेरुआ वस्त्र धारण किया.

“इंसान की सेवा ही भगवान की पूजा है” यह संदेश नरेंद्र नाथ दत्त और अन्य शिष्यों को रामकृष्णपरमहंस ने दिया. रामकृष्ण परमहंस ने अपने आखिरी समय में नरेंद्र नाथ तत्व को आश्रम के अन्यशिष्यों की देखभाल के लिए कहा और सभी शिष्यों को बुलाकर यह कहा कि अब नरेंद्र नाथ दत्त हीआप सब की देखभाल करेंगे. अंततः 16 अगस्त 1886 को  गुरु रामकृष्ण परमहंस समाधि में लीनहो गए.

swami vivekananda biography

तप एवं योग का जीवन

 गुरु रामकृष्ण परमहंस की मृत्यु के पश्चात शिष्यों और अनुयायियों ने आश्रम को समर्थन देना बंदकर दिया और धीरे–धीरे आश्रम की  आर्थिक स्थिति कमजोर होने लगी. जिसकी वजह से शिष्यों नेएक–एक कर आश्रम को अलविदा कह दिया.  मगर नरेंद्र नाथ एवं कुछ अन्य   शिष्यों ने “बारानगर” नामक स्थान पर  एक जीर्ण–शीर्ण घर को किराए पर लेकर  मठ बनाने का फैसला लिया.   पवित्र भिक्षा लेकर एक पुराने लगभग टूट चुके घर को एक मठ में तब्दील किया गया, इस  तरह रामकृष्णमिशन का पहला  आश्रम बनकर तैयार हुआ.  यहीं पर नरेंद्र नाथ और अन्य शिष्यों ने योगाभ्यास, एवं तपस्या करना शुरू किया.  

आश्रम के प्रारंभिक दिनों को याद करते हुए नरेन्द्रनाथ दत्त ने  एक बार कहा “हम उन दिनोंबारानगर स्थित मठ में  अनेकों धार्मिक अभ्यास किया करते थे हम सुबह तीन बजे उठकर जप औरध्यान में लीन हो जाया करते थे. दुनियादारी से एक मजबूत अलगाव की भावना  का विकास हम सबमें हुआ था, उन दिनों हमारे ध्यान में दुनिया है भी या नहीं यह बात नहीं आती थी.

स्वामी विवेकानंद (नरेन्द्रनाथ दत्त) का भारत भ्रमण

एक   दिन नरेंद्र नाथ ने   मठ छोड़ने का फैसला लिया और  1888 में  एक परिव्राजक के रूप में आश्रम को त्याग दिया और एक हिंदू घुमक्कड़ साधु की तरह जीवन जीने लगे. अब उनके पाससंपत्ति के रूप में सिर्फ एक कमंडल और भगवतगीता एवं द लिमिटेशन ऑफ क्राइस्ट नामक धार्मिक किताबें थी.  अगले 5 वर्षों तक नरेंद्र नाथ ने बड़े पैमाने में     लगभग पूरे भारतवर्ष का भ्रमण किया, वह  सभी धर्मों के अनेकों धार्मिक स्थानों पर गए और सभी धार्मिक रीति रिवाजों और परंपराओं काअध्ययन किया.  नरेंद्र नाथ ने गरीब लोगों को देखा उनके जीवन से जुड़ने का प्रयास किया इस तरह,  गरीबी और सामाजिक असमानता को देख कर उनका हृदय द्रवित हो  उठा.  और  आखिरकारउन्होंने समाज  के नव निर्माण का फैसला लिया.

 भिक्षा के सहारे, शिष्यों और   अनुयायियों द्वारा किए गए इंतजाम से उन्होंने पूरे भारत में अलगअलग  वर्गों, सामाजिक, धार्मिक संस्थाओं, सरकारी अधिकारियों, मजदूरों, आदि  से संपर्क  किया, और देश एवं समाज की वस्तुस्थिति को समझने का प्रयास किया. 31 मई 1893 को नरेंद्र नाथ दत्तअपने नए  नाम स्वामी विवेकानंद  ( जो कि उन्हें अजीत सिंह नहीं दिया था) मुंबई से शिकांगो केलिए रवाना हुए.

स्वामी विवेकानंद का विदेश दौरा

स्वामी विवेकानंद  पश्चिमी देशों के  भ्रमण के दौरान  जापान के कई शहरों का दौरा किया जैसे कि,  नागासाकी योकोहामा, ओसाका,  क्यूटो,  टोक्यो आदि  उसके बाद  चीन, कनाडा, अमेरिका  आदिदेशो के भ्रमण में गए.  30 जुलाई 1893 को वह अमेरिका के शिकागो शहर पहुंचे.  वहां सितंबर1893 मैं एक धार्मिक सभा का आयोजन होना था,  जिसमें की विश्व भर के अनेक  धर्मगुरु औरविचारकों को भाग लेना था.  स्वामी विवेकानंद भी इस सभा में भाग लेना चाहते थे लेकिन, धर्म संसदके  एक नियम जिसमें के उस सभा में वही आदमी भाग ले सकता था जो या   तो किसी धर्म का प्रतिनिधित्व करता हो या फिर आधिकारिक तौर पर किसी धर्म संगठन या देश द्वारा भेजा गया हो के कारण स्वामी विवेकानंद को निराश होना पड़ा.

स्वामी विवेकानंद ने   अपने स्वभाव के अनुसार ही काम किया और हार नहीं मानी.  वह  हावर्डयूनिवर्सिटी के प्रोफेसर जॉन हेनरी  से मिले, जिन्होंने स्वामी विवेकानंद को इससे पहले हावर्डयूनिवर्सिटी में बोलने के लिए आमंत्रित किया था. स्वामी विवेकानंद ने प्रोफेसर को एक  पत्र लिखाऔर धर्म संसद में भाग लेने की इच्छा जताई.  स्वामी विवेकानंद ने  अपने आप को एक सनातनी धर्म परंपरा का संत बताया.  ब्रह्म समाज के एक प्रतिनिधि  प्रताप चंद्र मजूमदार जो कि  शिकांगोस्थित धर्म संसद चयन समिति के सदस्य  थे ने स्वामी विवेकानंद को भारतीय  संत परंपरा काप्रतिनिधि बताया. इस तरह उन्हें शिकागो धर्म संसद में बोलने का अवसर  मिला.

विश्व धर्म संसद में स्वामी विवेकानंद

11 सितंबर 1893 को   शिकांगो के  आर्ट इंस्टिट्यूट में धर्म संसद  का आयोजन प्रारंभ हुआ. स्वामीविवेकानंद ने  वाक्य “अमेरिका के भाइयों और बहनों”  से शुरुआत कर हिंदुस्तान और हिंदू धर्म केबारे में व्याख्यान दिया. लगभग 7000 लोगों की भीड़ ने स्वामी विवेकानंद का जोरदार स्वागतकिया.  स्वामी विवेकानंद ने उस सभा में विश्व की सबसे पुरानी और महान संत परंपरा,  वैदिकइतिहास,  भारत के सहिष्णुता  एवं भाईचारे  के बारे में विश्व को परिचित कराया.  धर्म संसद केअध्यक्ष जॉन हेनरी ने कहा, “भारत  जो कि सभी धर्मों की मां है  उसके बारे में  एक गेरुआ वस्त्र धारणकिए हुए संत स्वामी विवेकानंद ने बहुत ही खूबसूरत तरीके से  समझाया, धर्म सभा में उपस्थित सभीलोगों का ध्यान अपनी तरफ खींचा,  यह बहुत ही खूबसूरत था”.  विवेकानंद ने पूरी दुनिया   केपत्रकारों का ध्यान अपनी तरफ खींचा, दुनिया भर  के अखबारों ने उन्हें ” एक चक्रवर्ती भारतीय साधु” कहा.

 न्यूयॉर्क  क्रिटिक नामक अखबार ने लिखा कि स्वामी विवेकानंद एक देवीय अधिकार प्राप्त वक्ताथे,  पीले और नारंगी रंग  मैं रंगा एक बुद्धिमान और ओजस्वी चेहरा उनके शब्दों   से कहीं कम नहींथा.  न्यूयॉर्क हेराल्ड में लिखा” स्वामी विवेकानंद धर्म संसद में निसंदेह सबसे महान व्यक्ति थे, उन्हेंसुनने के बाद हम सब महसूस  कर रहे हैं कि जिस राष्ट्र के पास इतने महान एवं ज्ञानी  संत हैं वहांमिशनरियों को  भेजना एक मूर्खतापूर्ण काम है.  अमेरिकी समाचार पत्रों ने स्वामी विवेकानंद को धर्मसंसद का सबसे लोकप्रिय और प्रभावशाली व्यक्ति बताया.

स्वामी विवेकानंद और अमेरिकी समाज.

 शिकांगो में धर्म सभा को संबोधित करने के बाद स्वामी विवेकानंद अमेरिका के अनेक  शहरों मैंअलग अलग लोगों  और संस्थाओं द्वारा बुलाए गए.   इसी सिलसिले में  ब्रोक्लीन एथिकल सोसाइटी द्वारा आयोजित  एक प्रश्न–उत्तर  सभा के दौरान स्वामी विवेकानंद ने कहा कि ” मेरे पास पश्चिमके लिए एक संदेश है जैसे कि बुद्ध के पास पूर्व के लिए था”

 स्वामी विवेकानंद पूर्वी और मध्य अमेरिका में लगभग 2 वर्ष तक रहे, इस दौरान उन्होंने  अनेकोंसभाओं को संबोधित किया.  उन्होंने अमेरिका स्थित बोस्टन, शिकांगो  आदि शहरों के अनेकों दौरेकिए और महान ज्ञान का विस्तार किया.  सन  1894  मैं स्वामी विवेकानंद ने अमेरिका के न्यूयॉर्कशहर में “वेदांता सोसाइटी” की स्थापना की इस तरह लगातार व्यस्त रहने  की वजह से उनकेस्वास्थ्य पर बुरा असर पड़ा और  उन्हें घूमना फिरना बंद करना पड़ा.  

स्वामी विवेकानंद का पच्शिम दुनिया में फैलाव.

इसके बाद भी उन्होंने योग और वेदांत  के ऊपर व्याख्यान देना नहीं छोड़ा, 1895  मैं लगभग 2 महीने उन्होंने न्यूयॉर्क स्थित थाउजेंड आइसलैंड पार्क  मैं अपने शिष्यों को वेदांत और योग की शिक्षादी. पश्चिमी देशों की अपनी यात्रा के दौरान उन्होंने दो बार इंग्लैंड के दौरे किए, इसी दौरान 1895  मैंउनकी मुलाकात एक आयरिश महिला मार्गरेट एलिजाबेथ नोबल से हुई,  जो बाद में  बहन निवेदिताके नाम से जानी गई.  

इंग्लैंड में अपनी दूसरी यात्रा के दौरान उनकी मुलाकात मैक्स मूलर से हुई जो ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटीमें इंडोलॉजी के विद्वान थे,  जिन्होंने    बाद में रामकृष्ण की बायोग्राफी अंग्रेजी में प्रकाशित की थी. उसके बाद विवेकानंद ने अनेकों यूरोपियन देशों का भ्रमण किया,  उन्हें दो अमेरिकन विश्वविद्यालय, हावर्ड यूनिवर्सिटी  और कोलंबिया यूनिवर्सिटी में पढ़ाने के लिए आमंत्रित कियागया मगर स्वामी विवेकानंद ने इनकार कर दिया, क्योंकि उन्हें लगता था  कि ऐसा करने से संत केरूप में उनके काम में बाधा आएगी. स्वामी विवेकानंद ने अपने  शिष्यों को पारंपरिक हिंदू धर्म केविचारों के बारे में समझाना शुरु किया.  उस समय नए विचारों का बोलबाला था, फिर भी उनके   अनुयायियों की संख्या  एवं     जोश मैं कोई कमी नहीं थी.  स्वामी

स्वामी विवेकानंद का अमेरिकी समाज पर असर

विवेकानंद के विचारों का अमेरिकन समाज मैं असर बढ़ता ही जा रहा था इसका मुख्य कारण स्वामीविवेकानंद द्वारा सुझाए जा रहे  योग अभ्यास और उनका असर था.  1886 में प्रकाशित उनकी एककिताब “राजयोग” ने अपार सफलता प्राप्त की और पश्चिमी सभ्यता के लोगों की योग के प्रतिअवधारणा  को पूरी तरह बदल कर रख दिया. राजयोग के प्रकाशित होने के बाद अमेरिका और अन्ययूरोपीय देशों मे  योगाभ्यास के क्षेत्र में नए आयाम स्थापित हुए जिसका पूरा श्रेय स्वामी विवेकानंदको जाता है.  

स्वामी विवेकानंद ने अनेकों यूरोपियन और अमेरिकन लोगों को अपनी ओर आकर्षित किया,  जिसमें मेरिन लुइस नाम की महिला जो कि फ्रांस से थी  जिनका नाम बाद में  स्वामी अभयानंद पड़ा,  औरलियोन  लैंडसवर्ग जिनका नाम बाद में स्वामी कृपानंद पड़ा  प्रमुख थे.  इन लोगों ने वेदांत सोसाइटीके मिशन को आगे बढ़ाया,  और यह सोसाइटी अब भी लॉस एंजेलिस में अनेकों विदेशी अनुयायियोंसे भरी रहती है.

 स्वामी जी को सैन जोस कैलिफ़ोर्निया मैं वेदांता  सोसायटी के मिशन को आगे बढ़ाने के लिए जमीनभी मिली जिसे अब शांति आश्रम के नाम से जाना जाता है यह साउथ कैलिफोर्निया के 12  मुख्यकेंद्रों में से एक है.  हॉलीवुड में भी एक वेदांता प्रेस है  जहां से वेदांत और हिंदू दर्शन से संबंधित किताबेंप्रकाशित एवं अनुवादित की जाती हैं .  अमेरिका और यूरोपीय देशों में रहते हुए  स्वामी विवेकानंद नेभारतीय दर्शन को नया आयाम दिया.

सामाजिक शिक्षा एवं जरगरूकता के लिए किये गए कार्य.

स्वामी जी भारत में अपने  शिष्यों और अनुयायियों  से लगातार संपर्क में रहते थे और आर्थिक मददभी करते रहते थे. अपने यूरोप प्रवास के दौरान उनके द्वारा लिखे गए पत्रों  से यह साफ है कि वहअपने मिशन को लेकर कितने  सतर्क थे.  ऐसे ही एक पत्र में उन्होंने स्वामी अखंडानंद को लिखा है,  की  खेत्री शहर के घर–घर जाकर गरीब और  पिछले वर्ग के लोगों को  साथ में ले और उन्हें धर्म केबारे में बताएं,  भूगोल जैसे विषयों के बारे मैं उन्हें समझाएं.   उन्होंने कहा की  आलसी बैठे रहने सेऔर राजाओं की तरह  खान–पान से और सिर्फ  जय रामकृष्ण, या हे भगवान कहने से  भगवान कीप्राप्ति नहीं होगी.  अगर  तुम्हें सच में भगवत प्राप्ति का अनुभव करना है तो गरीब और कमजोरलोगों की सेवा करनी होगी, मानवता की सेवा करनी होगी.

स्वामी विवेकानंद ने “द लिमिटेशन ऑफ क्राइस्ट”   के छः अध्याओं का अनुवाद किया जो 1889  “ब्रह्मा विधान” में प्रकाशित हुआ.  स्वामी विवेकानंद अपने शिष्यों  कैप्टन सेवियर  और  जे जे गॉडविन के साथ फ्रांस, इटली और नेपाल होते हुए  30 दिसंबर 1896  को   भारत लौट आए.   कुछसमय बाद सिस्टर निवेदिता भी भारत आ गई और उन्होंने भी अपनी पूरी जिंदगी भारत  मेंमहिलाओं के उत्थान और भारत की आजादी मैं लगा दी.

 स्वामी विवेकानंद भारत में( दिसंबर1896  से जून 1899)

यूरोप से आते  समय स्वामी जी  15 जनवरी 1891  को श्रीलंका पहुंचे,  वहां उनका जबरदस्तस्वागत हुआ और कोलंबो  मैं उन्होंने भाषण दिया. उसके बाद स्वामी विवेकानंद भारत  पहुंचे,  भारतपहुंचते हुए स्वामी विवेकानंद ने अनेक क्षेत्रों का भ्रमण किया,  जैसे कि रामेश्वरम, मदुरई, कुंभकोणम,  मद्रास आदि.  हर जगह उनका जोरदार स्वागत हुआ आम आदमी से लेकर  राजाओं तकने उनके व्याख्यान सुने.  उनकी रेल यात्राओं के दौरान लोग   ट्रेनों को रोक रोक कर उनसे व्याख्यानसुनने के लिए प्रार्थना किया करते थे.  उनकी यात्रा जारी रही, मद्रास  से वह कोलकाता गए  औरउसके बाद “अल्मोड़ा” जो कि  वर्तमान उत्तराखंड में है भी गए.  

अपने यूरोप प्रवास के दौरान स्वामी विवेकानंद ने भारत की महान परंपराओं के बारे में लोगों कोबताया. उन्होंने भारत के सामाजिक आर्थिक चुनोतियों के बारे में समाज को जागृत करने की कोशिशकी, जाती पाती को खत्म करने,  विज्ञान को आगे बढ़ाने,  उद्योग–धंधों को बढ़ाने, सामंती प्रथा कोखत्म करने  तथा गरीबी और भुखमरी को खत्म करने  के लिए अनेकों व्याख्यान दिए.  स्वामीविवेकानंद एक महान समाज सुधारक,  एक बेहतरीन गुरु,  एक संवेदनशील  संत,  और एक ओजस्वीवक्ता थे.

“स्वामी विवेकानंद के द्वारा कोलंबो मै दिए गए व्याख्यान एक किताब  “लेक्चर्स फ्रॉम कोलंबो टू अल्मोड़ा”  मै संकलित हैं.   यह  संकलन उनके राष्ट्रप्रेम और आध्यात्मिक  विचारधारा  को आज भी  उसी तरह प्रचारित-प्रसारित कर रहा है”.

स्वामी विवेकानंद द्वारा रामकृष्ण मिशन की स्थापना

 स्वामी विवेकानंद ने 1 मई 1897  को “रामकृष्ण मिशन”  की  स्थापना की थी. इस मिशन कीअवधारणा कर्मयोग पर आधारित है और, और यह “रामकृष्ण मठ  ट्रस्ट”  द्वारा शासित है.  रामकृष्ण मिशन और रामकृष्ण मठ,  दोनों का   मुख्यालय कोलकाता    स्थित   बेलूर मठ है.   स्वामी विवेकानंद ने दो अन्य मठों की स्थापना की थी जिसमें से एक “अद्वैत आश्रम”  उत्तराखंडके  चंपावत मै “मायावती” नामक स्थान पर स्थित है. अद्वैत आश्रम  की स्थापना 19 मार्च 1899 को स्वामी विवेकानंद की आज्ञा   पाकर उनके एक शिष्य जेम्स हेनरी ने की थी, जबकि दूसरा आश्रममद्रास में स्थित है.

“स्वामी विवेकानंद से प्रेरणा  पाकर  ही जमशेदजी टाटा ने वर्तमान कर्नाटक के बेंगलुरु में एक रिसर्च और शैक्षणिक संस्थान की स्थापना की थी जो कि वर्तमान में इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ  साइंस के नाम से जाना जाता है”

स्वामी विवेकानंद की दूसरी यूरोप यात्रा  और  वापसी

जून 1899  को स्वामी जी    अपने  अपनी शिष्य  सिस्टर निवेदिता के साथ दुबारा यूरोप की यात्रा परनिकल गए.  वह इंग्लैंड होते हुए दोबारा संयुक्त राज्य अमेरिका पहुंच गए.  अपनी इस यात्रा के दौरानस्वामी विवेकानंद ने  न्यूयॉर्क और सैन फ्रांसिस्को मैं “विधान सोसाइटी” की स्थापना की तथाकैलिफोर्निया में “शांति आश्रम” बनवाया उसके बाद एक धार्मिक आयोजन के लिए वह पेरिस की ओररवाना हो गए,  पेरिस में  स्वामी विवेकानंद ने शिवलिंग की पूजा और श्रीमद्भगवद्गीता के ऊपरव्याख्यान दिए.   तत्पश्चात स्वामी विवेकानंद वियना होते हुए  इस्तांबुल, एथेंस और इजिप्ट  भीगए. 9 दिसंबर 1900 स्वामी विवेकानंद भारत लौट आए.

स्वामी विवेकानंद मायावती स्थित अद्वैत आश्रम में.

उसके बाद स्वामी विवेकानंद  “चंपावत”  के मायावती  स्थित अद्वैत आश्रम गए, और बेलूर मठ मेंरहने लगे. जहां से उन्हों ने लगातार रामकृष्ण मिशन के कामों की देखभाल की उनको आगे बढ़ाया.  यहीं रहते हुए उन्होंने इंग्लैंड और अमेरिका स्थित  अपने कार्यों को अपने अनुयायियों के साथ आगेबढ़ाने का काम किया.  इसी दौरान वह कई बीमारियों की चपेट में आ गए और उनका स्वास्थ्य धीरे–धीरे खराब होने लगा.  खराब स्वास्थ्य के बावजूद उन्होंने बोधगया और वाराणसी की यात्रा की . धीरेधीरे उनके   खराब स्वास्थ्य के कारण उनकी यात्राएं कम होने लगी और उन्होंने अपने आप कोवेल्लूर मठ तक ही सीमित कर लिया.

स्वामी विवेकानंद की मर्त्यु/महासमाधि

स्वामी विवेकानंद ने पूरी दुनिया में घूम–घूम कर गरीबी, असमानता, अशिक्षा, एवं कुरीतियों केखिलाफ अनेकों कार्य किए.  समाज की सेवा के क्षेत्र में किए गए उनके  कार्यों के कारण भारत मैंअनेक क्षेत्रों में जन जागरण का  प्रसार हुवा. और समाज का उत्थान  हुआ.  लेकिन नियति के आगेबेबस होकर 4 जुलाई 1914 को स्वामी विवेकानंद ने अपने प्राण त्याग दिए. 4 जुलाई 1914 के दिनस्वामी विवेकानंद सुबह जल्दी उठकर बेलूर मठ गए और 3 घंटे तक ध्यान किया. अपने शिष्यों कोसंस्कृत व्याकरण एवं दर्शन का पाठ पढ़ाया तथा उन्होंने अपने साथियों के साथ वैदिक कॉलेज कीस्थापना की योजना पर चर्चा की.  

शाम के सात बजे के समय स्वामी विवेकानंद  अपने शिष्यों को आदेश दिया कि उन्हें डिस्टर्ब न कियाजाए और अपने कमरे में चले गए.  रात के करीब 9:20  पर जब स्वामी विवेकानंद ध्यान में लीन थेनिर्माण को प्राप्त हो गए. स्वामी जी के शिष्यों का कहना  था कि वह महासमाधि में लीन हो गए, चिकित्सा जांच के अनुसार उनके   सिर्  की एक नस के फट जाने के कारण  उनकी मृत्यु हुई थी.

भारत के लिए स्वामी विवेकानंद का योगदान

स्वामी विवेकानंद केवल संत नहीं थे; वह एक महान राष्ट्रभक्त,  विचारक,  और नयेपन के  ध्वजवाहक भी थे.  उस  समय के भारतीय समाज को स्वामी जी ने बहुत हद तक अपने विचारों सेप्रभावित कर प्रगतिशील कार्यों की ओर लगाया था.  भारत की धरती के लिए स्वामी विवेकानंद ईश्वरद्वारा भेजे गए  एक फ़रिश्ते की तरह  थे, उनके द्वारा किए गए कार्यों की  बदौलत और उनके द्वारासुझाए गए मार्गों मैं चल कर भारत दुनियाभर में महान देश की अपनी एक कल्पना को साकार रुपदेने में लग गया था. भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन में स्वामी जी की भूमिका एक मार्गदर्शक, एकविचारक के रूप में थी.

विवेकानंद ने देश की जनता को नए रास्तों की ओर बढ़ने के लिए प्रेरित किया. एक नैतिक जनसमूहतैयार कर स्वामी विवेकानंद ने भारतीय स्वाधीनता आंदोलन को एक महान  नैतिक हथियार एवंताकत प्रदान की, उनके द्वारा दी गई प्रेरणा की वजह से ही महात्मा गांधी  जी को  स्वतंत्रताआंदोलन में अपार  जनसमर्थन  मिला.  

स्वामी विवेकानंद का विश्वास था कि भारतवर्ष एक महान भूमि  है,  इसी भूमि ने अनेकों महान ऋषिमुनियों, त्यागियों,  सन्यासियों को जन्म दिया है,  भारतवर्ष में ही आदिकाल से लेकर हमेशा तक केलिए मनुष्य के लिए मुक्ति   के  खुले हुए हैं.  उन्होंने लोगों को संदेश दिया कि “उठो जागो और तबतक चलते रहो जब तक की लक्ष्य की प्राप्ति नहीं हो जाती”. भारतीय दर्शन की उनकी समझ में कोई संदेहात्मक विषय नहीं था.  आडंबरों से दूर,  स्वच्छ, न्यायपूर्ण एवं समानता पूर्ण समाज  कीस्थापना ही उनके लिए धर्म  का वास्तविक उद्देश्य था.  आडंबरों से घिरे हुए,  गरीबी एवं भुखमरी सेत्रस्त समाज को देख कर स्वामी विवेकानंद का मन खिन्नता से भर जाता था.  

आडंबरों एवं कुरीतियों को लेकर स्वामी विवेकानंद रूख.

अनेकों बार उस युवा संन्यासी    ने  अजीब एवं अच्छी लगने वाली,  तात्कालिक भारतीय समाज की रीति रिवाजों पर कड़े प्रहार किए,  मूर्ति पूजा के खिलाफ उनके बयान किसी विद्रोही के बयान की तरह होते थे.   वह कहा करते थे की 33 करोड़  देवी देवताओं को उनके स्थान से निकालकर 33 करोड़ गरीब एवं कमजोर लोगो  को वहां बैठा देना चाहिए.   स्वामी विवेकानंद के कालजई भाषण एवं बयान 19वीं शताब्दी के अंत तक भारतीय पुरोहितों एवं  सामंतवादी लोगों के मन में भयानक  किस्म का डर भर दिया था. उनका विश्वास था कि पूरी धरती में यदि कोई देश है जिसमें  मानव ईमानदार कोशिश  कर हर असंभव को संभव कर सकता है तो वह भारत ही है.

स्वामी विवेकानंद का विश्व समाज के लिए योगदान.

स्वामी विवेकानंद एक महान संत तो थे ही, साथ ही वह एक घुमक्कड़ किस्म के इंसान भी थे. अपनेमहान बिचारो और ज्ञानपूर्ण भासणो की बजह से स्वामी विवेकानंद ने विश्व ज्ञान समुदाय में अपनीमत्यपूर्ण जगह बना ली थी. दुनिया के कोने कोने से लोग उनको अपने यह होने वाले आयोजनों मेंआमंत्रित किया करते थे. इस तरह स्वामी विवेकानंद ने पूरी दुनिया में घूम –घूम कर, वेदांत, गीतासहित अनेक महान भारतीय ज्ञान को विश्व समुदाय को बांटा. जिससे पुरे विश्व समाज को लाभहुवा.

इसके अतरिक्त स्वामी विवेकानंद ने विश्व समुदाय, विषेकर युवाओ से नयेपन स्वीकारने औरसमाज को अधिक सवेदन शील बनाने का आवाह्न किया. स्वामी विवेकानद पूर्व से लेकर पच्छिमतक के अनेक देशो और विभन्न सहरो में घूम कर समाज को नवजागरण और आत्मिक उत्थान केलिए प्रेरित किया. योग एवं ध्यान के छेत्र में स्वामी विवेकानंद द्वारा किये गए कार्यो की वजह सेविश्व बिरादरी को बहुत लाभ हुवा.

स्वामी विवेकानंद के अनमोल वचन

  • मैं सिर्फ और सिर्फ प्रेम की शिक्षा देता हूं और मेरी सारी शिक्षा के उन महान सत्य पर आधारित है जो हमें समानता और आत्मविश्वास की सभ्यता का ज्ञान देती है .
  • आप को 33 करोड़ देवी-देवताओं पर भरोसा है लेकिन खुद पर नहीं  तो आपको मुक्ति नहीं मिल सकती खुद पर भरोसा रखो अडिग रहें और मजबूत बने हमें इसकी  जरूरत है.
  •  सफलता के तीन आवश्यक अंग है शुद्धता, धैर्य और दृढ़ता लेकिन इन सब से बढ़कर जो आवश्यक है वह है प्रेम.
  • उत्तिष्ठत जाग्रत प्राप्य वरान्निबोधत,  उठो जागो और लक्ष्य प्राप्ति तक रुको मत.
  •  जब तक आप खुद पर विश्वास नहीं करते तब तक आप भगवान पर विश्वास नहीं कर सकते.
  •  सत्य को हजार तरीकों से बताया जा सकता है फिर भी हर  एक   सत्य होगा.
  •  खुद को कमजोर समझना सबसे बड़ा पाप है .
  •  मनुष्य की सेवा करो भगवान की सेवा करो.
  •  कुछ मत पूछो बदले में कुछ मत मांगो जो देना है वह दो वह तुम तक वापस आएगा पर उसके बारे में अभी मत सोचो.
  • शारीरिक बौद्धिक और आध्यात्मिक रूप से जो कोई भी कमजोर बनता है उसे जहर की तरह त्याग दो.
  • एक समय में एक काम करो और ऐसा करते समय अपनी पूरी आत्मा उसमे डाल दो और बाकी सब कुछ भूल जाओ.
  •  सबसे बड़ा धर्म है अपने स्वभाव के प्रति सच्चे होना स्वयं पर विश्वास करो.
  •  किसी चीज से डरो मत, तुम अद्भुत काम करोगे यह निर्भयता ही है जो क्षण भर में परम आनंद लाती है.
  •  स्वतंत्र होने का साहस करो, जहां तक तुम्हारे विचार आते हैं वहां तक आने का  प्रयास करो, उन्हें अपने जीवन में उतारने का प्रयास करो.

स्वामी विवेकानंद द्वारा लिखा गया साहित्य

संगीत कल्पतरु, कर्मा योग, राज योग, वेदांत फिलॉसफी, माय मास्टर, लेक्चर फ्रॉम कोलोंबो तो अल्मोड़ा, जन योग, वर्तमान भारत.

स्वामी विवेकानंद की प्रेरणादायक जीवनी, कुछ मत्वपूर्ण तिथियां.

(swami vivekananda biography in hindi)

  • जन्म                                                                12 जनवरी 1863 कलकत्ता में.
  • पिता का नाम                                                     श्री विश्वनाथ दत्त
  • माता का नाम                                                     श्रीमती भुवनेश्वरी देवी
  • स्नातक की उपाधि-                                             1884 (कला)
  • विश्व धर्म सम्मेलन, शिकागो में प्रथम व्याख्यान   11 सितम्बर 1893
  • रामकृष्ण मिशन की स्थापना                                1 मई 1897
  • मायावती में अद्वैत आश्रम की स्थापना                 19  मार्च 1899
  • मायावती की यात्रा                                                10 जनवरी 1901
  • महासमाधि                                                         4 जुलाई 1902

स्वामी विवेकानंद से सम्बंधित महत्वपूर्ण स्थान

  • अद्वैत आश्रम                                                        मायावती, चम्पावत (उत्तराखंड)
  • बेल्लूर मठ                                                             कोलकत्ता, पच्छिम बंगाल
  • रामकृष्ण  मठ- बारानगर                                         बारानगर कोलकाता.
  • थियोसोफिकल सोयसायटी                                       अड्यार, मद्रास  (चेन्नई)
  • जनरल असेंबली  इंस्टीटूशन                                     कोलकत्ता
  • वेदांत सोसायटी                                                       न्यू यार्क
  • थाउजेंड आइसलैंड पार्क                                             न्यू यार्क
Swami vivekananda biography in hindi by HindiWall  

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